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तेरी कोशिश हो कि ये सूरत बदलनी चाहिए

अक्टूबर 15, 2015

Courtesy Byline:  (“हंसा जाइ अकेला” नवभारत टाइम्स पर प्रकाशित)

ज्यां पॉल सार्त्र ने 1964 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार यह कह कर ठुकराया था: “यदि कोई लेखक किसी राजनीतिक, सामाजिक या साहित्यिक विचारधारा से जुड़ा है तो उसे सिर्फ अपने खुद के संसाधनों का ही उपयोग करना चाहिए। और उसके पास अपना खुद का होता है सिर्फ लिखित शब्द। वह हर पुरस्कार जिसे वह स्वीकार करता है उसके पाठकों पर एक दबाव निर्मित कर सकता है, जिसे मैं उचित नहीं मानता।”

सार्त्र कहीं न कहीं, अनजाने में गांधी जी की इस बात के समर्थन में ही बोल रहे थे कि “राज्य हिंसा का ही संगठित रूप है।” उससे पुरस्कार लेकर आप किसी न किसी तरह के दबाव में रहेंगे ही और देर सवेर आपको अपनी विचारधारा के साथ समझौता करना ही पड़ेगा। ऐसे कम लोग होते हैं जो जान की परवाह किए बगैर भी डटे रहें। जे कृष्णमूर्ति ने आपातकाल के दौरान पुपुल जयकर से साफ़ कहा था कि वह अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं करेंगे, यदि वह चाहें तो इस शर्त पर उन्हें वार्ता के लिए भारत बुला सकती हैं। श्रीलंका में एक कम्युनिस्ट नेता माइकल परेरा से किसी जनसभा के बीच ही कृष्णमूर्ति ने कह दिया था कि यदि उन्हें असहमत होने से रोका गया और उनकी जान लेने की धमकी दी गई, तो वह तैयार हैं; कोई चाहे तो वहीं उनकी जान ले सकता है। प्रीतिश नंदी ने 1963 में एक भेंटवार्ता मेंउनसे पूछा कि उन्हें कोई जान से मार सकता है, क्या इसकी उन्हें कोई फिक्र नहीं? जवाब में कृष्णमूर्ति ने कहा “आप जरूर मुझे मार सकते हैं, पर मेरी आजादी को आप छू तक नहीं सकते।” संयुक्त राष्ट्र संघ की एक समिति में अपने भाषण के बाद मिले स्मारक चिन्ह को वह मेज पर ही छोड़ आए थे! इस तरह के साहस, स्पष्टता और स्वतंत्रता के उदाहरण भी हैं हमारे सोच और चिंतन की दुनिया में।

authors-killed.jpgउदय प्रकाश से पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू हुआ और उनके बाद नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए। इनके बाद सारा जोसफ और रहमान अब्बास ने भी अपने ईनाम लौटाए। जोसफ ने साहित्य अकादमी और अब्बास ने महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाया। लेखिका शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी परिषद से इस्तीफ़ा दिया और कवि के. सच्चिदानंद और कथाकार पी के परक्कद्वु ने साहित्य अकादमी की समितियों से इस्तीफे दिए। कन्नड़ भाषा में लिखने वाले छह लेखकों ने भी अपने पुरस्कार लौटा दिए। एक तरह से पुरस्कार के तिरस्कार का एक सिलसिला चल पड़ा है। स्पष्ट रूप से इन सभी बुद्धिजीवियों ने दादरी काण्ड के विरोध में और रूढ़ियों के खिलाफ लड़ने वाले नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे और कन्नड़ विद्वान् प्रो. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ यह कदम उठाया है। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने पुरस्कार लौटाने की निंदा की है और कहा है कि इससे साहित्य अकादमी कमजोर होगी। दूसरी ओर संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने टिप्पणी की है कि यह तो लेखकों का निजी मामला है!

अफ़सोस की बात है यह, पर पुरस्कारों के तिरस्कार का सिलसिला कहीं न कहीं देश के साहित्यिक जगत में व्याप्त दोहरे मापदंडों को भी उजागर कर रहा है। क्या जिस सरकार ने पुरस्कार दिया और जिससे लोगों ने सहर्ष पुरस्कार लिया, वह शुद्ध, पवित्र और किसी भी दोष से मुक्त थी? सिर्फ हिंसा के खिलाफ ही, और वह भी खून-खराबे के खिलाफ ही पुरस्कार लौटाए जाने चाहिए? किसी भी सरकार से कोई भी पुरस्कार लेकर कोई लेखक जाने अनजाने में उसकी हर नीति का समर्थक नहीं बन जाता? क्या भ्रष्टाचार हिंसा नहीं? क्या पूरे देश के साथ वादाखिलाफी हिंसा की श्रेणी में नहीं आएगी? जिन लेखकों ने मोदी सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करवाते हुए अपने पुरस्कार लौटाए हैं, उन्हें खुद से और साथ ही उनके पाठकों और आम नागरिक को भी ये सवाल पूछने चाहिए।

1984.jpgकिसी लेखक का तो सबसे बड़ा पुरस्कार तो यही है कि वह मूक बधिर लोगों के संसार में तार्किक और सही तरीके से सोच सकता है, खुद को व्यक्त कर सकता है, उसे और किसी पुरस्कार की जरूरत ही क्या है? उदय प्रकाश, नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी, शशि देशपांडे और साथ में अन्य कई लोगों ने अच्छा किया, हालाँकि कई लोग नयनतारा सहगल की चयनात्मक संवेदनशीलता पर सवाल उठा भी रहे हैं। उनके पुरस्कार प्राप्त करने के बाद सिख विरोधी दंगे देश भर में हुए। सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ तो पुरस्कार तब भी लौटाया जा सकता था। किसी साहित्यकार को ईनाम लेने से पहले ही सोच लेना चाहिए कि वह पुरस्कार क्यों ग्रहण कर रहा है? क्या यह पुरस्कार उसकी सृजनशीलता को निखारने में, उसके अधिक धारदार और प्रामाणिक बनाने में मदद करेगा? पुरस्कार देने वाली हर सरकार, उसकी संस्था, आपसे सहमति और चाटुकारिता की अपेक्षा रखेगी। क्या आपको कोई सरकार आपके विरोध और असहमति के लिए पुरस्कृत कर सकती है? क्या इससे पहले की देश की सभी सरकारें इतनी सही थीं कि इन वरिष्ठ साहित्यकारों को अपने पुरस्कार लौटाने का कोई मौका नहीं मिला?

author.jpgआप महानुभावों ने जो किया, वह बहुत अच्छा किया पर जिनके पास लौटने के लिए कोई पुरस्कार नहीं और फिर भी वे अपने स्तर पर असहिष्णुता कि इस संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भी समर्थन और बधाई दिए जाने की जरूरत है। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ विहीन, अपुरस्कृत, सभी गुमनाम और ईमानदार, जुझारू मित्रों को भी साधुवाद दिया जाना चाहिए जो अनर्गल और बेढंगी, मतभेद और फसाद बढ़ाने वाली बातों का हर स्तर पर विरोध करते रहे हैं। उम्मीद है सबके मिले-जुले प्रयास से सरकार को अपनी गलती का एहसास होगा।

एक विनम्र सुझाव यह भी है कि पुरस्कार लौटाने वालों को अपने इरादे भी साफ़ करने चाहिए थे। क्यों लौटा रहे हैं वे पुरस्कार वगैरा…उन्हें सरकार, प्रधानमंत्री, पुरस्कार देने वाली संस्था और आम पाठक को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखना चाहिए था, यह बताते हुए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। ऐसा नहीं कि इस देश में जब से इन नामचीन लेखकों ने लेखनी थामी है, कोई भयावह घटनाएं नहीं हुईं, या साम्प्रदायिक सौहार्द्र हमेशा से बना रहा है, बस अभी-अभी ही टूटा है। लोग पूछ रहे हैं कि पहले पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए, और उनका सवाल पूरी तरह से बेबुनियाद नहीं। यदि कोई लेखक इसलिए पुरस्कार लौटाता है क्योंकि उसका मकसद शोहरत कमाना है, तो यह देखना आसान है कि कभी पुरस्कार शोहरत दिलाता है, और कभी उसका तिरस्कार भी। हर पुरस्कार लौटाने वाले को यह सवाल खुद से पूछना चाहिए, कि उसका मकसद क्या है। एक नई किस्म की शोहरत हासिल करना, या फिर वास्तव में असहिष्णुता के खिलाफ अपनी नाराज़गी दर्ज कराना? साथ ही उन पुरस्कृत लेखकों का भी यह दायित्व बनता है कि वे पुरस्कार लेने और लौटाने के बारे में अपने क्या विचार रखते हैं। उन्होंने इस दौर में अपने पुरस्कार न लौटाने का फैसला क्यों किया है?

सकारात्मक बात तो यही है कि पुरस्कार लौटाने के प्रति सबकी पहली प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए कि यह एक सही कदम है और किसी भी तरह की द्वेष फैलाने वाली घटनाओं का विरोध करना लेखक का नैतिक कर्तव्य है। पुरस्कारों के प्रति अपनी विरक्ति दिखा कर वह एक तरह से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा भी करता है और यह जता देता है कि धन और प्रसिद्धि उसे खरीद नहीं सकते। उसे जंजीरों में भी बांधा नहीं जा सकता, उसकी दवात, कलम और आज के युग में उसका आई पैड या कंप्यूटर कोई छीन भी ले तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। फ़ैज़ ने अभिव्यक्ति की ऐसी ही आजादी के बारे में लिखा था:

faiz.jpg“मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है

कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने।”

 पर ऐसे प्रतिरोध के दौर में यह भी पूछना जरूरी है कि क्या लेखक समुदाय एक हंगामा भर खड़ा करना चाह रहा है, कि किसी बुनियादी बदलाव की तस्वीर भी उसके जेहन में साफ़ है? वह क्या इस असहिष्णुता की और हिंसा की संस्कृति का कोई विकल्प दिखा पा रहा है लोगों को? क्या वह अपने साहित्यिक दायरे में पुरस्कार की होड़ में और सत्ता पाने की कोशिश में तो नहीं लगा और इस तरह कहीं न कहीं वैसी ही संस्कृति को तो हवा नहीं दे रहा, जिसके विरोध में वह आज अपने ईनाम लौटा रहा है? क्या वह मौका मिलने पर साहित्य का मठाधीश बन कर, चयन समितियों का मुखिया बन कर, नए लेखकों को पुरस्कारों का लोभ दिखा कर साहित्य को भी बस एक अलग नाम से सस्ती सियासत का अखाड़ा तो नहीं बनाए जा रहा? दुष्यंत कुमार याद आ रहे हैं:

dushyant.jpg“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”

पूरी अस्तित्वगत ईमानदारी के साथ, पुरस्कार लौटाने वाले हर लेखक और लेखिका को यह सवाल पूछना चाहिए: उनका मकसद क्या है? अब क्या दायित्व है उनका इस विरोध के बाद?

लेखकों और कवियों का एक बहुत बड़ा गुमनाम समुदाय या तो ईमानदारी के साथ किसी ऐक्टिविजम का हिस्सा बन कर या सिर्फ अपनी अंतरदृष्टियाँ साझा करने के उद्देश्य से लेखन कार्य में लगा है। हज़ारों की तादाद में जूझते हुए लेखकों के बीच अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल की तरह कम लोग ही ख्याति पाने में सफल होते हैं। इस ख्याति के पीछे सिर्फ उनकी प्रतिभा, योग्यता और धारदार लेखन ही नहीं होता,, उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्थिति की भी भूमिका होती है। साहित्य के संसार में कई वाजपेयी और सहगल ख्याति की सुबह देखने से पहले गुमनामी की रात में ही दम तोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में जिन्होंने ख्याति अर्जित की, उनकी जिम्मेदारी भी बहुत अधिक है। उन्हें न सिर्फ साहित्यिक और सामाजिक, बल्कि राजनीतिक मूल्यों की भी दिशा-दशा तय करनी होगी। सिर्फ तिरस्कार से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, इससे आगे के रास्ते भी तय करने होंगे।

लेखन कभी भी धन कमाने का जरिया नहीं रहा। कम से इस देश में तो कभी नही रहा। अंग्रेजी में लिखने वालों को छोड़ दिया जाए, भले ही उनका साहित्य कितना भी बचकाना और सतही क्यों न हो, इस देश का आम लेखक, भले ही वह किसी भी भाषा में लिखता हो, मुफलिसी में ज़िन्दगी बिताता है। लेखन को वह जितना अधिक समय देता है, उसी अनुपात में उसे अपने घर परिवार और समाज से तिरस्कार भी मिल सकता है। आदर्शवादी, झक्की, सनकी जैसे कई खिताबों से उसे लगातार नवाजा जाता है। वह अपना खून, अपनी रूह डालता है अपने एक एक शब्द में, एक-एक कहानी और कविता में और उपेक्षा की मार झेल-झेल कर भी अपना एक संसार रचता है, अपने सपनों के साथ।

पर कितने लोग लेखक होना चाहते हैं? कितने माँ बाप हैं हमारे समाज में जो इस बात पर आह्लादित हो जाएंगे कि उनकी संतान ने लेखक बनने का फैसला किया है? मेरे ख्याल से हर मुमकिन कोशिश की जाएगी उसे रोकने की। लोग लेखक की पूजा कर सकते हैं, उसे महान बता सकते हैं, जहाँ-जहाँ जरूरत पड़े, और उपयोगी साबित हो, उसे उद्धृत कर सकते हैं; पर उनके खुद के बच्चे लेखक बनना चाहें, शायद ही कोई राजी होगा इस बात पर। ऐसे जड़वादी समाज में एक लेखक का विरोध सत्ता के मद में डूबे लोगों को कहाँ तक जगा पाता है, यह भी एक बड़ा सवाल है। आम तौर परआत्ममुग्धता और आत्मश्लाघा में लगे लेखक की बात का क्या महत्व है कि उसका पुरस्कार लौटाना सरकार को अपनी नीतियों और दर्शन को त्यागने पर मजबूर कर देगा? क्या राज्य इतना संवेदनशील होता है या फिर अपनी पूरी कुटिलता के साथ वह प्रतिरोध की आवाज़ को दबा देने के नए तरीके ईजाद करने में व्यस्त हो जाता है? सरकार के चर्चित संस्कृति मंत्री की तरफ से आया यह बयान यही दर्शाता है कि मोटी त्वचा पर खरोंच इतनी आसानी से नहीं लग सकती। जुबान पर लगा सत्ता का खून कुछ लेखकों के विरोध से धुल नहीं जाता और राज्य को सात्विकता के गुण से सजा-संवार नहीं देता।

पुरस्कार का तिरस्कार करने वाले साहित्यकारों ने अच्छा काम किया पर साथ ही उन्हें और भी रास्ते ढूंढने और सुझाने चाहिए। पुरस्कार लौटा भर देने से उनका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सिर्फ हंगामा खड़ा करने के तो हजारों तरीके हैं पर उनमें किसकी दिलचस्पी है! सवाल तो यह है कि सूरत कैसे बदलेगी देश-दुनिया की।

Courtesy Byline:  (नवभारत टाइम्स पर प्रकाशित)

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