जीवमात्र की जीवन-यात्रा का एक आध्यात्मिक रुपक है दीपावली

महाकाव्य रामायण के अनुसार, प्रकाशपर्व दीपावली भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद उनके अपने घर अयोध्या वापस आने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

लेकिन यह श्रीराम के वनवास के पश्चात अयोध्या वापस आने की केवल शुभ-कथा और त्योहार मात्र नहीं है। यह एक रुपक है, जो महान आध्यात्मिक संदेश देता है।

diwali and spiritualityएक सनातन त्योहार के रुप में दीपावली उजागर करता है कि श्रीराम का वनवास पर जाना एक रूपक है, एक उदाहरण है, जिसे मानवमात्र को आत्मसात करना चाहिए।

यह रुपक कहता है कि यह पृथ्वीलोक जीव (मानव) का अपना घर नहीं है। यहां पर जीव (मानव) को बारम्बार जन्म-मरण की प्रक्रिया से गुजरना है। इस रुप में पृथ्वी पर जीव (मानव) का आना उसका वनवास भोगना है।

इस प्रकार यह पृथ्वीलोक जीव (मानव) का स्वधाम नहीं है। उसका वास्तविक धाम कहीं और है, जो विराट की सत्ता से प्रत्यक्ष संचालित है।

पृथ्वीलोक पर जीव (मानव) का भिन्न-भिन्न योनियों में रूप धारण करना भी उसका निज-स्वरुप नहीं है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब यह पृथ्वीलोक जीव (मानव) का स्वधाम नहीं है, वह विराट की प्रत्यक्षसत्ता से संचालित अपने वास्तविक धाम को कैसे पहुंचेगा? उसे अपने स्वधाम पहुंचने के लिए क्या करना चाहिए?

भारतीय मनीषियों ने इसका उत्तर दशहरा से दीपावली के मध्य में खोजने का निर्देश दिया है। धर्मग्रंथों में उल्लिखित है कि भगवान श्रीराम दशहरा को लंकापति दशानन रावण पर विजय प्राप्त करने के बीसवें दिन अयोध्या आए थे। इस तरह उन्हें अयोध्या आने में 19 दिन लगे थे।

Lord Ram 1तत्वज्ञानियों के अनुसार, ये उन्नीस दिन 19 तत्वों के द्योतक हैं, 19 तत्वों के रुपक हैं। ये है: पंच महाभूत (5), पंच प्राण (5), पंच उप-प्राण (5) (इसमें तंत्रमात्राएं समाहित हैं) और अंतःकरण के चार तत्व (4)।

इन 19 तत्वों का संधान और ज्ञान कर मानव अपने आपको को विराट सत्ता से जोड़ता है।

आध्यात्मिक चिंतकों और तत्वज्ञानियों के अनुसार, यह सारी प्रक्रिया ही जीव (मानव) के समस्त ‘कर्मफल-बंधन से मुक्ति का मार्ग’ है। इसे संपन्न करने के उपरांत ही जीव (मानव) अपने समस्त कर्म संस्कारों को क्षयीभूत करता है और अपने मूल-स्वरुप में आने का प्रयोजन सिद्ध करता है।

उपर्युक्त 19 रुपकों या तत्वों का समाहार है दीपावली, जो प्रकाशमय यानी वास्तविक रुप में ज्ञानमय है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की परिणति दीपावली-स्वरुप है, अनंत सत्ता से मिलन का प्रसन्नता-दिवस है।

अर्थात, मानव अपना वनवास-भोग समाप्त कर अपने स्वधाम वापिस पहुंचता है। यही अवस्था योग में ‘स्वात्म-योग’ कही गयी है। अध्यात्म में यही वास्तविक ‘दीपावली’ है।

http://m.ndtv.com/khabar के “आस्था” सेक्शन में पब्लिश्ड

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