लाईक और कमेंट का जानलेवा खेल

बदनामी का दंश

आज से दो दिन पहले (18 दिसंबर, 2013), एक एनजीओ के एग्जेक्युटिव डायरेक्टर खुर्शीद अनवर ने खुदकुशी कर ली। खबर के मुताबिक, एक अन्य एनजीओ में काम करने वाली एक लड़की ने उनपर बलात्कार का आरोप लगाया था। यह घिनौना आरोप लगने के बाद वह काफी परेशान थे। लोगों का यह मानना है कि यह कदम उन्होंने डिप्रेशन में उठाया होगा।

हत्याएं और आत्महत्याएं रोज होती हैं। इनसे मन उद्वेलित होता है, दुःख होता है। इन सबके पीछे कोई-न-कोई वजह जरूर होती है। बलात्कार का आरोप लगना आत्महत्या का सबब होने के लिए काफी है, खासकर, एक स्वयंसेवी समाजसेवक के लिए तो निश्चित तौर पर। फिर, आजकल तो इस आरोप की बदनामी का दंश कुछ ज्यादा ही जहरीला है।

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई सवाल खड़े करती है। ये सवाल मीडिया, सोशल मीडिया और आमो-ख़ास की जेहनी अपरिपक्वता और जहालत की ओर चीख-चीख कर इशारा कर रही है।

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या या हत्या?

जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी साहब अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं- “खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली। लेकिन क्या इसे सचमुच आत्महत्या कहेंगे? मैं उन्हें एक संवेदनशील मगर जुझारू व्यक्ति के रूप में जानता था। … …खुर्शीद यारबाश शख्स थे। … …कुछ हफ्ते पहले सुना कि दिल्ली में ही एक अन्य एनजीओ में कार्यरत एक्टिविस्ट ने उनके खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया है। … …आरोप है कि उसकी शराब में खुर्शीद ने कुछ मिला दिया। उसकी तबीयत बिगड़ गयी। उसे वहीं रुकना पड़ा और सुबह कथित बलात्कार हुआ। लेकिन उसने यह सब न पुलिस को रिपोर्ट किया, न मेडिकल कराया, न कोई साक्ष्य दिया। कुछ दिनों बाद यह आरोप फेसबुक पर चल पड़ा। इस पर खुर्शीद विचलित हो गए और उन्होंने मानहानि का मुकदमा कर अदालत की शरण ली। कल कुछ टीवी चैनलों पर यह मामला उठ गया। उन्हें जानने वाले भी अब फेसबुक पर गरियाने लगे।”

Courtesy: Facebook Wall of Om Thanvi

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वे आगे लिखते हैं- “मुझे नहीं मालूम कि बलात्कार के आरोप में सच क्या था। रिपोर्ट दर्ज होती और उचित जांच के बाद गुनाह साबित होता तो खुर्शीद अनवर को फांसी पर लटका आते। … …कैसी विडंबना है कि कानून ने अभी अपना काम शुरू ही नहीं किया था और मीडिया में कोई गुनहगार करार दे दिया गया!”

इसी मुद्दे पर नवभारत टाइम्स के ब्लॉगर अरुणेश सी दवे लिखते हैं- “सवाल उठता है कि खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या क्यों की। क्या वह अपराध बोध से ग्रस्त थे? लेकिन यह आरोप तो उन पर काफी समय से लगा हुआ था। लेकिन पिछले चंद दिनों से सोशल मीडिया और कुछ न्यूज चैनलों में उनका मीडिया ट्रायल शुरू हो गया था।”

बकौल अरुणेश सी दवे, “खुर्शीद अनवर भारत में एक खोल के अंदर सिकुड़े समाज के ऐसे चंद लोगो में से थे जो बेबाक रूप से समाज की खामियों, उसके अंदर मौजूद कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ बोलते थे। जब बहुसंख्यक समाज में पैदा होकर मुझ जैसे टटपुंजिया लेखक को इतनी धमकियां गालियां मिलती हैं, तो खुर्शीद अनवर किन हालातों में अपनी आवाज बुलंद करते थे, यह समझना मेरे लिये कोई मुश्किल काम नहीं है। और यही बात मुझे व्यथित कर गई कि जो आदमी इन सब को झेल सकता है वह क्यों बलात्कार के कथित आरोप को झेल नहीं पाया?”

केवल लाईक और कमेंट का खेल नहीं रहा अब सोशल मीडिया

यह दुर्घटना बता रही है कि आज सोशल मीडिया काफी शक्तिशाली हो चुकी है। अपनी नकारात्मक स्वरूप में इतनी शक्तिशाली कि किसी जान ले ले।

जी हां, केवल लाईक और कमेंट का खेल नहीं रहा अब सोशल मीडिया। एक समय था, जब सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करते ही लाईक और कमेंट (कॉम्पलिमेंट ज्यादा) की बारम्बारता से दिल बाग़-बाग़ हो उठता था।

फिर एक समय आया, जब इस मीडिया पर “मैं तेरी खुजाऊं, तू मेरी खुजा” का सबसे खराब चलन ने जोर पकड़ा। यह आज भी बदस्तूर जारी है।

Courtesy: Khaalbaada by Arunesh C Dave on Navbharat Times Online

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फिर एक दौर शुरू हुआ, इस मीडिया के माध्यम से अपनी विचारधारा को थोपने का- एक पेज बनाओ और अपनी सड़ी-गली सोच को इतनी बार, इतने तरह से पहुंचाओं कि दिमाग ‘करप्ट’ हो जाए।

और, आज जो दौर चल रहा है, वह है स्वार्थ-सिद्धि के लिए किसी को चिन्हित करना, लक्षित होकर तर्कों-कुतर्को का हमला बोलना, जनमानस में उसकी छवि को इस तरह तारतार कर देना कि वह खुर्शीद अनवर की तरह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाए।

कुछ दिनों पहले मैंने इसी ब्लॉग पर सोशल मीडिया पर एक आलेख लिखा था- “सोशल साइट मतलब खतरे-ही-खतरे” (https://tathakathit.wordpress.com/2012/08/24/social-site-matlab-khatre-hi-khatre/)। मैंने लिखा था- “एक वर्ग को चिन्हित कर सोशल साइटों पर जो सूचनाएं दी गईं, उसने एकबारगी सभी को ग्रस लिया। यकीन नहीं होता कि इन साइटों पर हुए कुछ अपडेट इतना बड़ा बखेड़ा पैदा कर सकते हैं। मगर ऐसा हुआ है। लिहाजा, मानना पड़ेगा कि अभिव्यक्ति का यह माध्यम एक दुधारी तलवार है। सूचना ही शक्ति है (इन्फोर्मेशन इज पॉवर) एक सकारात्मक नजरिया है, मगर इसका नकारात्मक और घिनौना रूप सर चढ़कर बोल रहा है।”

बकौल अरुणेश सी दवे, “सोशल मीडिया तो अब मेन स्ट्रीम मीडिया से भी चार कदम आगे है। यहां आपकी विचारधारा के आधार पर आपके मित्र और दुश्मन हैं। और ऐसे दुश्मन व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता रखने वाले लोगों से हजार गुना ज्यादा बेरहम और बेशरम हैं। ये उन गिद्धों के तरह हैं जो आपके कमजोर होते ही टूट पड़ने की तलाश में रहते हैं। अविकसित सोशल मीडिया सेंस एक बेहद खतरनाक चीज है, जहां वैचारिक मतभेद निजी मतभेद से ज्यादा संगीनियत रखता है।”

दरअसल, खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या नहीं की है। उसे हम जैसे सभ्य लोगों ने ताने मार-मार कर मार डाला। तो, खुश जो जाइए कि अब किसी को सजा देना अब हमारे बस से बाहर की चीज नहीं रही! अब सोशल साईट होगी अदालत और हम सब होंगे जज। लेकिन रुकिए, अगली बारी आपकी है, यह भी जान लीजिए।

अब कहां जा के सांस ली जाये

मेरे बीएचयू के एक जूनियर विनीत कुमार सिंह और मुझ जैसे अनेक लोग मेनस्ट्रीम मीडिया की ऊबन से बचने के लिए फेसबुक, ट्विटर, गूगल-प्लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लेते हैं। लेकिन, अब इन सोशल नेटवर्किंग साइटों से एक डर-सा लगने लगा है, मैं न सही, कही-न-कहीं शायद कोई अपना पीड़ित हो रहा है।

AAJKAL: Social Site Matalab Khatre Hi Khatre by Shyamnandan

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लेकिन जाएं तो जाएं कहां? अखबार, टीवी और रेडियो की तरह यहां आना ही होगा, डर-डर के, सहम-सहम के, आशंका के जहर में डूबकर। स्व. जगजीत सिंह द्वारा गायी गयी एक ग़ज़ल आज की सामाजिक जहालत, अपरिपक्व सोशल मीडिया और मेरे हालात के ऊपर काफी मुफीद बैठती है: “दोस्ती जब किसी से की जाये/दुश्मनों की भी राय ली जाये/मौत का जहर है इन फिजाओं में/अब कहां जा के सांस ली जाये।”

यह दुर्घटना सोशल मीडिया की व्यापक शक्ति का महज एक छोटा-सा चित्र खींचती है। वह समय ज्यादा दूर नहीं जब यह मीडिया भाई को भाई से, पति को पत्नी से, दोस्त को दोस्त से और पड़ोसी को पड़ोसी से लड़वा देगी।

अभी समय है, हम सचेत हो जाएं तो अच्छा है। कहीं इस मीडिया की स्वतंत्रता हमारा सबसे बड़ा बंधन न बन जाए। हमें ध्यान रखना होगा कि हमारी सामाजिक अभिव्यक्ति कहीं असामाजिक षड़यंत्र न हो।

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