साहित्य, सिनेमा, टेलीविजन और सनी लिओनी

बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स की प्रेस-विज्ञप्ति का मजमून

हाल-फिलहाल फेसबुक के माध्यम से मुझसे परिचित होने वालों में एक अहम नाम है – पंकज शुक्ला सर। आज उनकी एक पोस्ट को पढ़ने के बाद यह आलेख लिखे बिना रहा न गया।

उनके पोस्ट के अनुसार, चौथे बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स के लिए जारी की प्रेस-विज्ञप्ति के मजमून एक अंश कुछ यूं है:

THE BIGGEST OF ENTERTAINERS WALK THE RED CARPET AT THE 4TH BIG STAR ENTERTAINMENT AWARDS.

SENSATIONAL PERFORMANCES BY BOLLYWOOD’s BEGAM KAREENA KAPOOR, DABANG SALMAN KHAN & THE VIVACIOUS SUNNY LEONE…

इन पंक्तियों से ऊपर वे लिखते हैं, “टेलीविजन की मानसिकता क्या है? इसे समझने के लिए चौथे बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स की अभी अभी मिली प्रेस रिलीज़ की शुरुआती लाइनें ही काफी हैं।”

बकौल पंकज सर, “सनी लिओनी एक झटके में करीना कपूर और सलमान खान की बराबरी पर आ खड़ी हुईं। उन्हें यहां तक कौन लाया? कम से कम सिनेमा में उनका संघर्ष या अदाकारी की उनकी काबिलियत तो नहीं ही ना! ये भारतीय टेलीविजन का सनी लिओनी काल है।”

मांसल-सौंदर्य बनाम उघड़ी मांसलता और नंगई

Facebook post of Pankaj Shuka Sir

Facebook post of Pankaj Shuka Sir

साहित्य और सिनेमा (टेलीविजन भी) में मांसल-सौंदर्य को बिम्ब-प्रतिबिम्ब के माध्यम से चित्रित करने की एक जबरदस्त और अक्षुण्ण परम्परा पहले भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।

रचना की दृष्टि यह गलत भी नहीं है, क्योंकि यह नैसर्गिक है। इस नैसर्गिकता को एक सम्यक और संतुलित रूप से जिसने भी उकेरा वह कृति (साहित्य व सिनेमा) ‘क्लासिक’ मानी गयी है।

लेकिन, यह भी सच है कि रचनाकारों (लेखक, निर्माता, निर्देशक, कलाकार आदि) का एक ख़ास वर्ग इस अवधारणा, पहले भी और आज भी, के विपरीत एक धारा बहाता आया है।

यह वर्ग इस सौंदर्य को उपमा, उपमान, बिम्ब, प्रतिबिम्ब, संकेत और प्रतीक से न कहकर, यह यकीन करता है कि केवल मांसलता को उघारना और बदन नंगा करना ही सृजन है।

आज यह दूसरा वर्ग हावी है और सनी लिओनी है उस वर्ग की एक सर्वश्रेष्ठ शाहकारी खोज। इसमें और ऐसे कई नामों को शामिल किया जा सकता है, उसकी एक लम्बी फेहरिश्त है।

पहले गन्दगी बोओ, फिर फैलाओ और तब गन्दी बात करो

जनता (दर्शक) का इसमें कोई दोष नहीं है। क्योंकि, वह तो ‘कल्टीवेट’ किया जाता है, जैसे फसल के लिए पहले बीज बोया जाता है, फिर खाद-पानी दी जाती है, फिर पकने दिया जाता है और अंत में काट लिया जाता है।

Babaji Ka Thullu - Popularized by Comedian Kapil Sharma

Babaji Ka Thullu – Popularized by Comedian Kapil Sharma

ठीक ऐसे ही, रचनाकारों के इस दूसरे वर्ग ने काफी रचनात्मक रूप से पहले जनता रूपी जमीन पर नंगई का बीज बोया – कैबरे, आईटम सॉन्ग, वैम्प किरदार आदि के रूप में, फिर इसे ज्यादा ‘स्पेस’ देकर स्थापित करने की सफल कोशिश की और आज हालात यह है कि आज इसकी फसल काटने से कोई भी गुरेज नहीं कर रहा है – न जनता/दर्शक और न रचनाकार।

वर्तमान में टेलीविजन भारतीय संस्कृति को प्रचारित-प्रसारित करने का एक बेहतरीन माध्यम है। इस पर दिखाए जानेवाले लगभग सभी प्रोग्राम इस संस्कृति के वाहक हैं, चाहे वह सास-बहू का झगड़ा हो, ‘नेगेटिव’ स्त्री-चरित्रों द्वारा किया घात-प्रतिघात या कपिल की फूहड़ कॉमेडी और उसका बाबाजी का ठुल्लु। लेकिन यह हमारी संस्कृति का एक नकारात्मक पहलू भर है, नंगई नहीं।

सिनेमा के बाद अब टेलीविजन की बारी है। घरेलू मनोरंजन के महान फलक पर मांसलता और नंगई का बीज बो दिया गया है। जिस प्रेस-रिलीज के अंश को पंकज सर ने अपने फेसबुक वॉल पर पोस्ट किया है, यह उससे साफ़ जाहिर है।

अभी का दौर भारतीय टेलीविजन का सनी लिओनी काल भले ही न है, लेकिन उस काल की शुरुआत हो चुकी है। प्रत्यक्षम् किं प्रमाणम् – पहले यह ग्रे शेड में होगा, फिर डार्क से डार्कर, वर्तमान सिनेमा की तरह…!

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One Response to “साहित्य, सिनेमा, टेलीविजन और सनी लिओनी”

  1. Bollywood Song Lyrics Says:

    A fascinating discussion is definitely worth comment.
    There’s no doubt that that you should write more about this
    topic, it might not be a taboo subject but typically people do
    not talk about such topics. To the next! Many thanks!!

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