सोशल साइट मतलब खतरे-ही-खतरे

कभी-कभी लगता है कि युद्ध इंसान की जरूरत है। इसलिए वह युद्ध के नए-नए तरीके ईजाद करता रहता है। किसी ने कहा है ‘शांति चाहिए तो युद्ध करो’। सभ्यता के विकास की कहानी पर गौर करें, तो यह बात सच प्रतीत होती है। कुछेक हालिया घटनाएं एक नए प्रकार के संघर्ष की दस्तक दे चुकी हैं। इस लड़ाई में सूचना और आधुनिकतम संचार तकनीक का जमकर इस्तेमाल होने के कारण इसे साइबर युद्ध का एक प्रकार माना जा रहा है।

पिछले दिनों बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई, पुणे, चेन्नै समेत देश के कई हिस्सों से पूर्वोत्तर भारत के लोग भाग रहे थे। कारण यह कि पूर्वोत्तर के लोगों के मन में यह डर बैठ गया था कि उनकी जिंदगी खतरे में है।

इसके पीछे इंटरनेट और सोशल साइटों की बड़ी भूमिका थी। क्योंकि, कुछेक बहुत लोकप्रिय सोशल साइट पर ऐसे स्टेटस अपडेट हुए कि पूर्वोत्तर के लोगों को बेंगलुरु, पुणे आदि शहरों में बुरी तरह से टॉर्चर किया जा रहा है, उन्हें जलाया जा रहा है, मारा जा रहा है।

बस फिर क्या था? सैटेलाईट और इंटरनेट की कृपा से यह खबर सारी दुनिया में फैल गई। विडम्बना यह कि एक तरफ देश के प्रधानमंत्री लाल किले से एकता, समानता, सहभागिता और समन्वित विकास का सुर आलाप रहे थे, दूसरी ओर लोग पलायन कर रहे थे। देश का दिल एक जोश और रवानी में धड़क रहा था, मगर देश का एक बाजू आग में धधक रहा था। जैसे, दिल और बाजू में कोई तालमेल ही नहीं।

Cyberwar courtesy switched.com

सवाल दिमाग का है, तो आजकल दिमाग लगाता कौन है। पूर्वोत्तर के लोग तो खास कर अपनी दिल की सुनने के लिए मशहूर है। यही कारण है कि अपने ऊपर हमले की आशंका से डरे पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन रुकने के बजाय बढ़ता ही जा रहा था।

हालांकि पलायन में कमी आई है, लेकिन केंद्र और राज्य के नेताओं के अलावा स्थानीय प्रशासन की अपीलों के बावजूद पूर्वोत्तर के लोगों के मन में बैठा डर निकल नहीं पा रहा है।

एक वर्ग को चिन्हित कर सोशल साइटों पर जो सूचनाएं दी गईं, उसने एकबारगी सभी को ग्रस लिया। यकीन नहीं होता कि इन साइटों पर हुए कुछ अपडेट इतना बड़ा बखेड़ा पैदा कर सकते हैं। मगर ऐसा हुआ है। लिहाजा, मानना पड़ेगा कि अभिव्यक्ति का यह माध्यम एक दुधारी तलवार है। सूचना ही शक्ति है (इन्फोर्मेशन इज पॉवर) एक सकारात्मक नजरिया है, मगर इसका नकारात्मक और घिनौना रूप सर चढ़कर बोल रहा है।

सोशल मीडिया का अनसोशल रूप

वर्तमान में लगभग सभी संगठन, समुदाय और शिक्षित (कम या अधिक) व्यक्ति धड़ल्ले से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। पॉपुलर सोशल मीडिया, जैसे- फेसबुक, लिंक्डइन, ट्विटर, बिगअड्डा, ब्लौगस्टर, फेसपार्टी, गूगल प्लस, मायस्पेस, टैग्ड, ऑरकुट, बाडू आदि कई साइट्स का इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक़ काफी सोच-समझकर किया जा रहा है।

इसके कुछ रूप बहुत ही विकसित हैं, मसलन जेनरल फ्रेंड्स नेटवर्किंग साइट, बिजनेस नेटवर्किंग साइट, विचारधारा (आइडियोलॉजी) विशेष को प्रमोट करने वाली साइट आदि। ब्लॉग को इससे अलग नहीं रखना चाहिए क्योंकि सोशल नेटवर्किंग वहां भी होती है।

कहने को तो यहां सब कुछ व्यक्तिगत है, मगर वास्तव में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है। एक दूरगामी सकारात्मक सोच पर आधारित ये सोशल साइटें वर्तमान में ‘अनसोशल’ स्वरुप ग्रहण करती जा रही हैं। इसके रंग-ढंग पारंपरिक मीडिया से बिलकुल जुदा हैं, तस्वीर कुछ अच्छी नहीं बन रही है।

सोशल साइट मतलब खतरेहीखतरे

अगर आप हॉलीवुड फिल्मों, विशेषकर जेम्स बांड, के शौकीन हैं, तो वर्ष 2002 में प्रदर्शित ‘डाय अनदर डे’ याद होगी। इसमें एक मीडिया मुग़ल सूचना और संचार साधनों को अपनी मुट्ठी में कर दुनिया में वर्चस्व कायम करना चाहता है। (कुछेक फिल्म क्रिटिक्स ने इस फिल्मी मीडिया मुग़ल की साम्यता रुपर्ट मर्डोक से की है)। इसी बरक्स हम कह सकते हैं, सिनेमा अगर समाज का आईना है, तो पिछले हफ्ते सोशल पर मीडिया पर अपडेट हुईं सूचनाएं वे विषैली बीज हैं, जो कल जहरीली पेड़ बनेगी।

Exodus of Mal-information courtesy fastcompany.com

गौरतलब है कि डाय अनदर डे में परोसी गईं काल्पनिक कहानी से हाल में घटित सच्ची घटनाओं में एक भारी अंतर है। फिल्म में सूचना का संकेद्रण किसी एक पास है। वहां एक आदमी या संगठन अपनी कुत्सित महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाता है। मगर, आज जिसे देखो, जाने-अनजाने, वही इसमें शामिल है।

वर्तमान में भांति-भांति की सूचनाएं हर जगह, हर समय, हर किसी के पास मौजूद है। मोबाइल फोन को शामिल कर दें, आज तो अच्छी-बुरी सारी खबरें उंगलियों पर है।

साइबर सिटीजन, नेटीजन, ग्लोबल सिटीजन कहलाने में गर्व महसूस करने वाले आज की पीढ़ी अपने दिमाग का लोहा मनवाना चाहती हैं। विडम्बना यह कि उनका यही हिस्सा सबसे कमजोर है। किसी ने एक ट्विट किया नहीं कि सारी बुद्धि हवा हो जाती है। सोचने में वक्त ही नहीं लगाते (तेज जो ठहरे?)। भेड़िया-धंसान से भी गई-गुजरी हालत है।

मायावी अंतर्जाल

इन्टरनेट और सोशल मीडिया पर लॉग-इन होने के बाद आज एक बहुत बड़ा वर्ग खुद को महान खोजी पत्रकार और विशद ज्ञानी समझने लगा है। कुछ खोजना हो, तो सर्च-इंजन खंगाल डालते हैं। तमाम की तरह की ‘पीडिया’ के मुरीद ये लोग ऐसी-ऐसी चीजें निकालते हैं, जैसे पारस पा लिया हो। ब्रह्मज्ञान मिल गया हो।

इनके लिए हर चीज, हर सूचना सच्ची है। किसी ने किस मानसिकता से वे सूचनाएं वहां ठूंस रखीं हैं, उस पर तनिक भी विचार किए बिना अपना लेना इस वर्ग की एक खासियत है। दूसरी खासियत है, सकारात्मक सूचनाओं से ज्यादा निराशावादी और नकारात्मक जानकारी से वास्ता रखना।

यही वजह है कि एंटी-सोशल साइटें ज्यादा लोकप्रिय हो रही हैं, जो सोद्देश्य व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विरूद्ध प्रोपेगैंडा चला रही हैं। इनका सिद्धांत ही है कि किसी भी झूठ को फर्जी-अनफर्जी तथ्यों और आंकड़ों के मुलम्मे में इस तरह पेश करो, इतनी बार ‘पुश’ करो कि वह सच और सिर्फ सच नजर आए।

ये एंटी-सोशल साइटें व्यक्तिगत भी हैं और संस्थागत भी। पूर्वोत्तर के भोले-भाले लोगों को भड़काने का आरोप पड़ोसी मुल्क पर लगाकर चाहे जितनी सियासी रोटी सेंकी जाए, मगर पसमंजर साफ़ है। इसकी मंशा तथाकथित साइबर सिटिजन को निशाना बनाकर एक अघोषित युद्ध आरोपित करने थी। जिसमें हद तक सफलता भी मिली।

iTrap courtesy masterfile-illustrations.com

जैसे-जैसे मायावी साइबर दुनिया का विस्तार होगा, स्थिति विकट होती जाएगी। थोपी गई सूचनाओं के जाल में फंस कर एक मुल्क दूसरे मुल्क का ही नहीं, एक समुदाय दूसरे समुदाय का ही नहीं, पड़ोसी-पड़ोसी के खून का प्यासा होगा।

एक फर्जी सूचना सोशल साईट, इमेल और मोबाइल पर एसएमएस, एमएमएस के रूप में नुमाया होगी और लोग-समुदाय और देश परस्पर चीखने-चिल्लाने लगेंगे। आपस में भिड़ पड़ेंगे। जैसे अभी हम अपने पड़ोसी मुल्क से भिड़ पड़े हैं कि बर्मा-थाईलैंड के चित्रों और सूचनाओं को फर्जी रूप में गढ़कर पड़ोसी मुल्क ने पूर्वोत्तर के लोगों को निशाना बनाया है। देश में अराजकता और गृहयुद्ध भड़काने की कोशिश की है।

कुछ दिनों बाद हमारा पड़ोसी मुल्क इसे अमेरिकी करतूत बताए, तो हैरत नहीं होगी। क्योंकि, कई फर्जी सबूत चीख-चीख कर उसकी ओर इशारा कर रहे होंगे।

कैसा होगा साइबर युद्ध?

साइंसदानों का मानना है कि अगला विश्वयुद्ध अंतरिक्ष में लड़ा जाएगा। लेकिन जो हालात बन रहे हैं, उसे देख कर कह सकते हैं कि आगामी विश्वयुद्ध अंतरिक्ष में नहीं, बल्कि सही मायने में अंतर्जाल (इंटरनेट) पर तोड़-मरोड़ कर पेश की गई तथ्यों, आंकड़ों और सूचनाओं के माध्यम से इसी धरती पर हमलोगों के बीच लड़ा जाएगा।

साइबर युद्ध के रूप में मैलवेयर, वायरस अटैक, गोपनीय सूचनाओं की हैकिंग, फिर उसकी रेप्लिकेशन आदि से इसे विश्व व्यापी बना दी जाएगी। तरीका थोड़ा अलग है, लेकिन विकिलीक्स जैसे अनेक संगठन और लोग ऐसे ही कामों में लिप्त हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि सोशल साइटों के साथ मीडिया भी ऐसी संस्थाओं और लोगों की करतूतों को चाव परोसती हैं, बिना परिणाम को सोचे-समझे।

ऊर्जा संकट, जल-संकट, खाद्यान्न का अभाव, सामुदायिक चेतना, व्यक्तिवाद का नारा, अतिसक्रियता आदि इसके हथियार बनेंगे। समय-समय पर हवा देकर इस आग को भड़काने में कोई कसर नहीं रखी जाएगी। इसमें शिरकत करने वाले गुट और लोग लड़ाई और युद्ध करवाए बिना चैन की सांस नहीं लेंगे।

क्योंकि, हमने अपनी बुद्धि से ज्यादा डिजिटल मीडिया और इंटरनेट पर पसरे अधकचड़े ज्ञान और सोशल साइटों को महत्व देना शुरू कर दिया है। अभी समय है कि हम सचेत हो जाएं, नहीं तो एक समय हम बात-बात पर आपस में लड़ते हुए नजर आयेंगे, तो ज्यादा आश्चर्य नहीं।

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2 Responses to “सोशल साइट मतलब खतरे-ही-खतरे”

  1. sudarshansingh Says:

    Reblogged this on Sudarshansingh’s Weblog.

  2. लाईक और कमेंट का जानलेवा खेल | आजकल AAJKAL Says:

    […] था- “सोशल साइट मतलब खतरे-ही-खतरे” (https://tathakathit.wordpress.com/2012/08/24/social-site-matlab-khatre-hi-khatre/)। मैंने लिखा था- “एक वर्ग को चिन्हित […]

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