जिन मुख निकसत नाहिं…

नोएडा के रजनीगंधा चौक की गंध

तारीख: अप्रैल 5, 2012, समय: रात के 11 बजकर 35 मिनट, अभी थोड़ी देर पहले ऑफिस से लौटा हूं. यूं तो आए-दिनों सड़कों पर कई घटनाएं देखने को मिलती हैं, जो एकाध घंटे जेहन में टिकती भी नहीं. लेकिन, अभी आते वक़्त एक छोटी-सी घटना ने मुझे इस कदर झकझोर दिया कि बस पूछिये मत. हुआ कुछ यूं कि…

Rajnigandha Chauk - NOIDA

Rajnigandha Chowk of NOIDA
Courtesy: epaper.hindustantimes.com

आज आम दिनों से कुछ अधिक वर्क-प्रेसर होने के कारण एनडीटीवी के ओखला स्थित ऑफिस से काफी देर से निकला. ‘एनडीटीवी गुड टाइम्स’ के एक अनजान सहकर्मी ने मोदी मिल तक बाईक की लिफ्ट दी, ताकि मैं नोएडा के लिए बस पकड़ सकूं (शुक्रिया अनजान दोस्त). थोड़ी इंतज़ार के बाद एक बस आई, मगर वह केवल महारानी बाग़ तक ही जाती. यहां मैंने अपने जवारी मित्र रवि की नसीहत का भरपूर पालन किया. दरअसल, जब पहली बार दिल्ली आया था, तो रवि ने एक बड़ी माकूल सलाह दी थी कि रात में 10 बजे के बाद जिस रूट पर जा रहे हो, उस रूट की जो भी बस मिले, पकड़ कर आगे निकलते रहो, नहीं तो वहीं फंसे रहोगे. तो रवि की बात को अमल में लाते हुए, मैं महारानी बाग़ आ पहुंचा. पांच-सात मिनट के भीतर वहां से एक कैब मिल गई. तीन सवारियां महारानी बाग़ से चढ़ीं और 5 सवारियां उस कैब में पहले से बैठी थीं.

डीएनडी फ्लाईवे पर सांय-सांय कर उड़ती हुई कैब टोलब्रिज से कब गुजरी, पता ही नहीं चला. दिमाग शायद अभी भी ऑफिस के किसी उलझन को सुलझाने में लगा हुआ था. कैब के रुकने से तन्द्रा टूटी तो देखा कि मैं रजनीगंधा चौक पहुंच चुका हूं. फिर, मैंने इस चौक की खुशबू (रजनीगंधा पान मसाले की इलायची वाली खुशबू) को भी महसूस किया, जो कि आदतन मैं रोज करता हूं.

प्यारी मुस्कान वाला वह नौजवान

Beggar

Beggar, Courtesy: dailysg.com

रात कहिए या शाम… मेरी घड़ी तीन मिनट कम ग्यारह बजने का ऐलान कर रही थी. रुकी हुई कैब के पास नौजवान-सा दिखने वाला एक आदमी होठों पर बड़ी प्यारी मुस्कान लिए ड्राइवर के पास पहुंचा. ड्राइवर किसी एफएम रेडियो स्टेशन से आती हेमंत कुमार के एक मशहूर गीत ‘है अपना दिल तो आवारा’ को सुनने और गुनगुनाने में मशगूल था. उसने उड़ती निगाह से उस आगंतुक नौजवान को देखा और गाने की धुन में खो गया. ड्राइवर की साथ वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी. ड्राइवर या तो उस लड़की का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश कर कर रहा था या वह वाकई में हेमंत कुमार के दिलकश गाने को दिल से एन्जॉय कर रहा था, इस बारे में मैं पक्के तौर पाक कुछ कह नहीं सकता. मैंने भी उस नौजवान को नोटिस नहीं किया होता अगर कैब वहां लगभग ढाई मिनट तक रुकी न होती. मैंने ध्यान से उस नौजवान को देखा. काफी हट्टा-कट्टा था वह, मगर कपड़े फटे-चिटे, लगभग तार-तार थे. हालांकि उसने न तो हाथ फैलाया था और न ही मुंह से कुछ बोला था. मगर उसकी निरीह आंखों में कई सवाल कौंध रहे थे. साथ ही, उसकी आंखों में चमक रही थी ‘कुछ पाने की एक निराशा भरी ललक’. शायद, आपको पढ़ने में अजीब लग रहा हो कि कोई ललक निराशा भरी कैसे हो सकती है? बिलकुल हो सकती है…और होती है जनाब. मौका मिले तो किसी भिखारी की आंखों में गौर से झांककर देखिएगा. कलेजा चाक न हो जाए तो कहिएगा.

खैर, ये तो रोज की बात है. मगर, हर रात की नहीं. पहला, एक तो रात के ग्यारह बज रहे थे. दूसरा, वह भिखारी एक नौजवान था. तीसरा, उसके होठों पर बड़ी प्यारी-सी मुस्कान थी. चौथा, मुझे वह कोई आम भिखारी नहीं लगा. पांचवां, जब ड्राइवर ने उसकी उपेक्षा की तो उसकी मुस्कान और भी गहरी हो गई थी. बस, गहरी होती उसकी इसी मुस्कान ने मुझे हिला दिया.

लगातार गहराती उसकी मुस्कान ने मेरे दिमाग में तुरत-फुरत में कई विचार और मायने पैदा कर दिए. मसलन, उसकी मुस्कान यह कह रही हो- ‘अच्छा, मुझे इग्नोर कर रहे हो. चलो… कोई बात नहीं. “मेरा क्या है, तुमने कुछ नहीं दिया तो क्या हुआ, कोई और दे देगा..!” या फिर उसकी मुस्कान मानो यह कह रही थी- “जानबूझकर अनजान बन रहे… बड़े मियां, बगल में लड़की है तो आपके भाव बढ़ गए.” नहीं तो फिर उसकी गहराती मुस्कान का यह भी मतलब हो सकता है- “जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका और भी अधिक भला.”

काल-चिंतन: मुस्कान का मुखौटा

फिर अचानक प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका ‘कादम्बिनी के किसी अंक में छपी स्वर्गीय संपादक राजेंद्र अवस्थीजी के सम्पादकीय ‘काल-चिंतन’ कॉलम की एक चिंतन मोटे तौर पे जेहन में उभर आई. शब्दशः पूरी तरह याद तो नहीं, संभवतया सन 1987-88 के किसी अंक में उन्होंने कुछ ऐसा लिखा था जिसका लब्बो-लुआब कुछ यूं बनता था- “कितने कमजोर हैं हम कि एक भिखारी भी हमें हिला देता है. वह मांगता और हम द्रवित हो जाते हैं. सिक्का-दो सिक्का उसके हाथों पर रख देते हैं. हमसे कितना मजबूत है वह भिखारी कि हमारी दी हुई चीज पर कोई भी प्रतिक्रिया या भाव व्यक्त नहीं करता है. कोई धन्यवाद नहीं, कोई मुस्कान नहीं, कोई ख़ुशी नहीं. जिस निरीहता से आता है, उसी निरीहता से किसी और के आगे हाथ पसार देता है. कुछ नहीं मिलने पर भी वही याचकता और निरीहता, कुछ मिल जाने पर भी वही भाव.” सन 88 में मैंने दसवीं भी पास नहीं किया था. उस समय भी स्व. अवस्थीजी की यह बात कुछ विशेष पल्ले नहीं पड़ी थी और आज भी अधकचरे तौर पर ही समझता हूं. (मानवीय भावों, मनोभावों और मनोवैज्ञानिक भावों को समझने की मुझमें उत्कट लालसा रही है पर कभी कुछ ख़ास उखाड़ नहीं पाया.)

Time and We

Time and Man, Courtesy: andreapietrangeli.blogspot.com

मगर, नोएडा के रजनीगंधा चौक के रात के इस भिखारी की बात ही कुछ अजीब थी. अभी ये पंक्तियां लिखते समय उसे याद करने की पूरी कोशिश कर रहा हूं और उसके मुस्कान को सही रूप में समझने की कोशिश कर रहा हूं तो मुझे लग रहा है कि वह कोई सूफी किस्म का इंसान रहा होगा. जो खुद को “प्रियतमा” के रूप में रखकर हर इंसान में खुदा का अक्स देखता है और उसे अपना “प्रीतम” मान लेता होगा. मनोवैज्ञानिक रूप से, एक सूफी प्रियतमा कभी अपने प्रीतम से नाराज नहीं रह सकती है. शायद तभी तो वह भिखारी अपनी गहराती हुई मुस्कान से संसार को छलनी किए जा रहा था…”कि कोई बात नहीं प्रीतम…आखिर मुझे कब तक इग्नोर करोगे?”

मनोविज्ञान के एक दूसरे पहलू पर गौर करता हूं तो लगता है कि वह ज्यादा सटीक है. जब हम पूरी आशा रखकर किसी से कुछ मांगते हैं, और सार्वजनिक रूप से हमें कुछ प्राप्त नहीं होता है, तो लोगों को भरमाने के लिए और अपनी झेंप मिटाने के लिए हम ‘मुस्कान का मुखौटा’ ओढ़ लेते हैं.

तात्कालिक रूप में शायद उस नौजवान भिखारी ने भी यही किया होगा. मगर, मैं सोचता हूं कि अगर उसे भीख ही मांगनी थी तो वह रात के ग्यारह बजे क्यों मांग रहा था? और भीख मांग रहा था तो एक प्यारी-सी मुस्कान लिए क्यों मांग रहा था? वह गिड़गिड़ा क्यों नहीं रहा था, याचना क्यों नहीं कर रहा था? क्या उसे भी किसी ने कॉर्पोरेट रिटेल मार्केटिंग वालों की तरह ट्रेनिंग दी थी “…कि जैसे किसी प्रोडक्ट को सूटेड-बूटेड टाई पहने कोई सेल्समैन मुस्कुराकर पेश करता है और सामनेवाले को आकर्षित करता है, …तुम भी उसी तरह बेधती हुई मुस्कान लिए भीख मांगा करो.” मगर हाय रे किस्मत! रिटेल मार्केटिंग के उस सेल्समैन की असफलता की तरह, जैसे किसी घर की घंटी बजाने के बाद कोई श्रीमतीजी दरवाजा तो खोलती हैं, मगर सेल्समैन के मुंह से पहला शब्द निकले, इससे पहले श्रीमतीजी बोल उठतीं हैं कि “भैया मुझे नहीं लेना है”, …ठीक वैसे ही उस नौजवान भिखारी की स्ट्राटेजी यहां धराशायी हो गई थी. एक लेवल पर सेल्समैन और वह भिखारी मुझे एक जैसे लगे.

जिन मुख निकसत नाहिं

रात ग्यारह बजे नोएडा के रजनीगंधा चौक पर ढाई मिनट के ठहराव ने मुझे तीसरी जमात में रटवाई गई रहीम के एक दोहे की भी भक से याद दिला दी-

रहिमन वे नर मर चुके,

जो कुछ मांगन जांहि.

उनसे पहले वो मुवें,

जिन मुख निकसत नाहिं.”

एक बार फिर स्व. राजेंद्र अवस्थी के ‘काल चिंतन’ के काल की याद हो आई. वह सन 87-88 और उससे भी पहले का दौर था और वह उस समय की सोच थी. उस समय ग्लोबलाजेशन और लिबरलाइजेशन की रेख तक नहीं थी. आज सन 2012 है, ग्लोबलाजेशन और लिबरलाइजेशन का उत्तरोत्तर दौर, मानवीय उन्नति की अति-आधुनिकतावाद का भी उत्तरोत्तर दौर. लगभग हर चीज में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है और जिनमें नहीं आया है, वे आउटडेटेड और उपेक्षित हैं.

Despair

Despair - A painting by Omar Vizquel, Courtesy: artculture.com

फिर अचानक समझ में आ गया कि जब रहीमजी ने यह दोहा रचा होगा, तब उस समय भी समाज में एक वर्ग मांगने वाला होगा और एक वर्ग नहीं देनेवाला होगा. उसे देखकर ही तो उन्होंने यह लिखा होगा. आज भी इस परम्परा में कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है, यह रजनीगंधा चौक पर इलायची और केसर के खुशनुमा गंध साथ पसरी इस घटना की बदनुमा गंध ने मुझे समझा दिया.

आप मुझसे पूछ सकते हैं कि आखिर मैंने उस भिखारी के लिए क्या किया? साहब, मैं कुछ नहीं कर पाया. कोई एक्सक्यूज नहीं है मेरे पास. आखिर मैं भी तो ग्लोबलाजेशन और लिबरलाइजेशन के उत्तरोत्तर दौर, मानवीय उन्नति की अति-आधुनिकतावाद के उत्तरोत्तर दौर में जी रहा हूं. जी हां, मैं भी पूरी तरह से खतावार हूं.

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10 Responses to “जिन मुख निकसत नाहिं…”

  1. Rahul Trivedi Says:

    Shyam Bhaiya aisi dil ko choone wali bahut saari ghatnaye hoti hai !!!! Aapne naujawan bhikhari ki baat ki hai !!! mujhe sahanubhooti hoti hai lekin ye sahanubhooti tab khatam ho jaati hai jab aise logo is kaam ko apna business bana lete hai !!!! aisa nahi hai ki poore dilli aur noida me kaam khatam ho gaya !!! bheekh maangne se jyada agar wo kaam dhoodhne me lalak dikhaye to uska jyada bhala hota !!!! waise aapne apni bhawnao ko bahut hi pyare dhang se sab ke saamne rakha hai !!! lekhan me aapka koi jawab nahi !!!!!

  2. Vineet Says:

    ab kya kar sakte hain…..waise bhi….yaha har koi bheekh hi maang raha hai….bas tareeka thoda alag hai….jaise chor to sabhi hain….sabhi ne koi na koi aisa apradh kiya hau hota hai ki agar saamne aa jaye to IPC ki dharao me ulajh jkaaye……par….is lekh ki sabse khaas baat yah hai ki ye aapko shuru se ant tak baandhe rahta hai….behatreen……..

  3. Vivek Rastogi Says:

    भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए शब्द-भंडार बहुतों से बेहतर है आपका… हालांकि पूर्णतः सहमत नहीं हूं भावों से… यदि हृदय द्रवित होने के बाद भी कुछ नहीं कहा, पूछा या किया, तो अपने हदय की भावनाओं को दबाना आप स्वयं सिखा रहे हैं… और यदि उन्हें इसी प्रकार दबाते रहिएगा, तो एक दिन सिर्फ शब्द-भंडार ही रह जाएगा… आशा है, अन्यथा न लेंगे इस परामर्श को… 🙂

  4. RY Says:

    thank u friend for writing so heart touchable story. realy we must think about other.

  5. Neeraj Singh Naruka Says:

    shyam ji abhi aapne bahut kuch dekhna hai . mere guru ji ne kaha hai sansar har roz ghatne wali shukh va dukh bhari ghatnayen ghtit
    hoti rahengi un sab ko dekhte huve jo nirantar aapne karm ko pura kar piche dekhe bager aage badhta rhega vahi safal inshan kahlayega
    Neeraj Singh Naruka
    RN Films & Media

  6. आलोक मिश्र Says:

    आपके दुविधा को मैं समझ सकता हूं, समयाभाव की वजह से आप कुछ न कर सके। मार्मिक अनुभव

  7. rajeev Says:

    मैं आज कल यही सोच रहा हूं कि क्या हम अब ज्यादा भावुक होते जा रहे हैं…. तमाम खबरें हमें झकझोर रही हैं…. कई दिन तक खबरों का असर रहता है…. लोगों को देखने के बाद मन सोचता रहता है… आप भी भावुक हैं, संवदेनशील है, समाज के चिंतक हैं…. एक दिशा देने का माद्दा रखते हैं…. बधाई…

  8. Rajendra Singh Kunwar 'fariyadhi' Says:

    बेहतरीन वाह क्या बात है आपके इस सन्दर्भ ने हमें भी भावनाओं कि गहराईयों में उत्तार दिया, आप के शव्दों कि पकड़ और पंक्तियों कि कसावट के लिए बहुत बहुत आभार, आज पहली बार आप के ब्लॉग पर पहुंचा बहुत बहुत बधाई आप कि इस उम्दा लेखनी को !

  9. Deepak Tripathi Says:

    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति….बहुत ही सुन्दर वर्णन. प्रवाह, भाषा, मर्म, चित्रण और भी हर चीज प्रभावशाली है.

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