ऑकलैंड के राक्षस भारत आओ

न्यूजीलैंड का राक्षस तानिवा

Newspaper without News, Courtesy: http://www.activerain.com

हिंदी या अन्य प्रादेशिक अखबारों में ख़बरों की किल्लत जैसे उनकी नियति बन गई है. एक तो विज्ञापनों की चकाचौंध में खबरें वैसे भी काट-छांट दी जाती हैं, दूसरा, क्षेत्रीय हितों का एकमात्र प्रवक्ता होने का जुनून अखबारों को देश-दुनिया की आमोखास समाचार को छापने से शायद जबरन रोकती हैं. इससे परे बात की जाए अंतर्राष्ट्रीय ख़बरों को कवरेज देने की तो पाठक ढूंढ़ते रह जाते हैं कि किसी अमुक देश में कि क्या-क्या घटित हुआ है. अंग्रेजी अख़बारों की पॉलिसी इस मामले में कुछ हद तक ठीक है. गाहे-बगाहे हिंदी अख़बारों में यदि एकाध खबरें किसी देश से सम्बंधित होती भी हैं तो कृपा संपादक महोदय की. अगर किसी सुधी संपादक की खुर्दबीनी नजर में कोई अंतर्राष्ट्रीय घटना अटक गई तो वह समाचार जरूर बनती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं. परन्तु, काबिलेगौर यह कि ऐसी खबरें काम की न होकर महज रोचक और मानवीय अभिरूचि को तुष्ट करने वाली होती हैं.

यहां उद्देश्य अखबारों की मीनमेख निकालने या बखिया उधेड़ने से नहीं बल्कि एक खबर से है, जिसका संबंध न्यूजीलैंड से है. बकौल ऑस्ट्रेलियन असोसिएटेड प्रेस (एएपी) न्यूजीलैंड के प्रसिद्ध शहर ऑकलैंड के स्थानीय निवासियों ने सरकार से कहा है कि वह राक्षस द्वारा संरक्षित जमीन को नष्ट न करे और 2.1 अरब डॉलर के एक रेलवे प्रोजेक्ट को रोक दे. यहां ‘राक्षस’ शब्द में इतना आकर्षण है कि कोई भी खबर को पढ़े बिना रह नहीं सकता. याद रहे, राक्षस शब्द मानवीय अभिरूचि को तुष्ट करने वाली शब्दावली है. एएपी के मुताबिक रेल नेटवर्क को बेहतर करने और शहर की सड़कों से कारों को हटाने के मकसद से ऑकलैंड में इस रेल प्रोजेक्ट को शुरू किया गया है. वर्तमान में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ ऑकलैंड और अन्य शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं. आखिर कारण क्या है?

दरअसल इस निर्माण कार्य के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों का कहना है कि इस रेल प्रोजेक्ट का रास्ता एक आंख वाले राक्षस ‘तानिवा’ के क्षेत्र से होकर गुजरता है. राक्षस तानिवा को यह प्रोजेक्ट काफी नागवार लग सकती है, और यदि ऐसा हुआ तो इसका खामियाजा सभी को भुगतना होगा. इस प्रोजेक्ट का सबसे अधिक विरोध वहां की एक जनजाति माओरी द्वारा किया जा रहा है. माओरी लोगों का मानना है कि ऑकलैंड और हैमिल्टन शहर के बीच की जमीन तानिवा की है. ‘सूत उवाच…’ की तरह बात को लंबा न खींचते हुए सीधी कहानी यह है कि तानिवा एक काल्पनिक और मिथकीय राक्षस है, जो सदियों से ऑकलैंड शहर के नीचे रहता है. माओरी जनजाति के एक सांविधिक बोर्ड के मुताबिक वर्तमान रेल प्रोजेक्ट से वह जमीन नष्ट हो जाएगी जहां कभी तानिवा गश्त करता था. बोर्ड का कहना है कि इस प्रोजेक्ट को शुरू करने के दौरान राक्षस का ध्यान नहीं रखा गया जबकि वह वर्षों पहले से यहां था. इस सब से वह नाराज हो सकता है और लोग परेशानी में पड़ सकते हैं.

यह राक्षस है कौन और कैसा है इसका चरित्र!

Tahiwha, Courtesy: http://www.teara.govt.nz

यहां एकबार फिर हिन्दी अखबारों की मजबूरियां बयां होती हैं. यह सर्वविदित है कि खबरों, विशेष कर विदेशी खबर, के मूल स्रोत हैं न्यूज एजेंसियां, जैसे- असोसिएटेड प्रेस (एपी), रायटर्स, एजेंसी फ्रांस प्रेस (एएफपी), प्रेस असोसिएशन, ऑस्ट्रेलियन असोसिएटेड प्रेस (एएपी) आदि-आदि. ये सभी एजेंसियां अंग्रेजी में खबरें परोसती हैं, जिनके एजेंडे बिल्कुल सेट होते हैं. कमोबेश प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई), एशियन न्यूज इंटरनेशनल (एएनआई) जैसी भारतीय एजेंसियां भी यही काम करती हैं और अंग्रेजी को मानक मानती हैं. ऐसे में ऑस्ट्रेलियन असोसिएटेड प्रेस (एएपी) से कोई खबर भारत में आती है, तो साथ में कई जटिल विचारधाराओं और सिद्धांतों के तानेबाने के साथ आती है. ऐसी एजेंसियों के खबरों के निहितार्थ को समझे बिना शब्दशः अनुवाद कर प्रकाशित करना हिंदी के प्रतिष्ठित से लेकर छोटे-बड़े और अन्य प्रादेशिक अखबारों की अघोषित परंपरा बन गई है. यह सर्वथा गलत है. हिंदी के बड़े से लेकर मझोले व छोटे अखबारों पर बहुधा यह इलजाम लगाया जाता रहा है कि वे अनुवादशाला मात्र हैं, फ़ौरन से पेश्तर किसी खबर की तर्जुमा करना ही उनकी रोजी-रोटी है.

बात फिर न्यूजीलैंड के राक्षस पर आती है. वाकई में यह राक्षस है कौन और इसका चरित्र कैसा है? इसकी शोध व अनुसंधान किए बगैर कोई संपादक इस खबर को पेश करता है तो यह उनका मानसिक दिवालियापन है और भारतीय पत्रकारिता की विडंबना. न्यूजीलैंड के इस राक्षस के कई नाम हैं, जिनमें एक नाम है ’होरोत्यू’. इसका अर्थ है- संरक्षक. माओरी लोकगीतों में इस काल्पनिक संरक्षक तानिवा की महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित की गई है. मसलन, वह सांस्कृतिक पहरूआ और अच्छे लोगों का सच्चा हितैषी है. वह अभिभावकों की तरह लोगों की सुरक्षा करता है, आदि-आदि. तो ऐसा भला राक्षस प्रगति का प्रतिरोधक, विकास का बाधक कैसे हो सकता है?

यहां यह साफ़ दिख रहा है कि माओरी जनजाति अपनी जनजातीय विरासत को समाप्त होने से बचाने के लिए अपना विरोध जता रहे है. ‘तानिवा’ उनकी सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है. ऑकलैंड-हैमिल्टन के जिस क्षेत्र को इस रेल प्रोजेक्ट से जोड़ने अभियान शुरु किया गया है, उससे न केवल माओरी विस्थापित होंगे बल्कि उनकी नैसर्गिक जनजातीय अस्मिता और पहचान महज कुछ सालों में केवल इतिहास के पन्नों पर पढ़ी जाएगी. ऐसे विकट हालात में माओरी अपनी विरासत की रक्षा और पहचान के बरक्स तानिवा का हौव्वा खड़ा करते हैं तो क्या गलत है. माओरी सांविधिक बोर्ड की यह चेतावनी कि तानिवा अभिभावकों की तरह हमारी सुरक्षा करते हैं लेकिन अगर हमारा कोई काम उन्हें पसंद नहीं आता है तो वे हमें मार भी सकते हैं. यह वक्तव्य सीधे तौर पर यह नस्लीय भेदभाव से उपजने वाली हिंसा की ओर इशारा करती है, जो चिंता का विषय है.

Editor's Cabin, Courtesy: http://www.cartoonstock.com

‘नोज फॉर न्यूज’ जैसे सनातन धर्म का पालन करने वाले गुणी पत्रकार और संपादकीय सलाहकार, फटकार की चाबुक से घुट्टी की तरह इस मंत्र को पीने-पिलाने वाले ‘न्यूज सेंस’ के धनी संपादकवृन्द इस खबर के पीछे की खबर को सूंघने में कैसे नाकाम हो गए? इसे समझने में किसी संपादक से भूल कैसे हो सकती है? महज रोचक खबर चस्पां करने के जोश में वे जहानियत को ताक पर कैसे रख सकते हैं? जबकि इसके एवज में ऐसी कई महत्त्वपूर्ण खबरें होंगी जिसे उन्होंने संपादकीय शान बघारने वाली रद्दी की टोकरी में डाल दिया होगा.

साम्राज्यवादी एजेंडा व्हाईट मैन्स बर्डन

इतिहास को समझने वाले भलीभांति जानते हैं कि आज भी पश्चिमी देशों की नीति में साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक एजेंडा लागू करना उनकी पहली प्रायिकता है. भले ही वे इसे कुछ नाम दे दें. न्यूजीलैंड की आप्रवासी जनसंख्या और वहां के मूल निवासी माओरी लोगों के संदर्भ में तानिवा को खलनायक और प्रगति की राह में रोड़ा बताने के पीछे भी यही एजेंडा हावी है.

White Man's Burden, Courtesy- www1.assumption.edu

न्यूजीलैंड भारत की तुलना में एक विकसित देश है, जहां ऑस्ट्रेलिया की तरह आप्रवासी यूरोपीय लोगों ने न्यूजीलैंड को एक नयी पहचान दी. ठीक वैसे ही जैसे कभी ब्रितानियों ने भारत को एक नयी पहचान दी थी, असभ्य को सभ्य बनाने का जिम्मा उठाया था. न्यूजीलैंड में माओरी लोगों मुद्दा “व्हाईट मैन्स बर्डन” (white man’s burden) की नीति पर आधारित है. ऐतिहासिक रूप से उनकी पहचान दकियानूसी सोच रखने वाली पिछड़े समुदाय के रूप में पेश की गई है. और अंततः, पहचान की इस प्रक्रिया में वहां के मूल निवासी माओरी पिछड़े रह भी गए और तथाकथित रूप से जनजाति घोषित हो गए. अब जनजाति का तमगा लगने के पीछे कुछ तो वजह होगी. शायद एक आंख वाला राक्षस तानिवा एक वजह हो! क्योंकि राक्षस तो पिछड़े हुए होते हैं, जबकि वैम्पायर और ड्रैकुला एडवांस होते हैं. “गॉड सेव द क्वीन” के साथ राष्ट्रीय-गान “गॉड डिफ़ेंड न्यूजीलैंड” गानेवाले माओरी पश्चिमी देशों की दृष्टि में बेशक बेहतरीन मछुआरे, तीरंदाज और कुशल नाविक हों, अच्छा क्रिकेट थोड़े ही न खेल सकते हैं.

काश भारत में भी होते एकाध तानिवा

काश भारत में भी कुछ राक्षसों को जिन्दा रहने दिया गया होता, तो यह कभी गुलाम न होता. उनके भय से हमारे सांस्कृतिक पतन की दर कुछ तो कम रहती और सांस्कृतिक विविधता कुछ बच पाती. आजादी के पहले और आजादी के 65 सालों बाद भी भारत में तानिवा जैसे राक्षसों जरूरत है. मगर अफ़सोस, हमारे महाकाव्यों के महानायकों ने बड़े नामचीन राक्षसों को त्रेतायुग में भारतीय भू-क्षेत्र के साथ समुद्र को भी लांघकर उन्हें मार डाला और जो बचे-खुचे रह गए उसे द्वापर युग में संगठित रूप से मार डाला गया. कलियुग में तो हम मनुष्य ही राक्षस बनने की सफलता के करीब हैं, मगर हममें से तानिवा जैसा होरोत्यू शायद ही कोई हो.

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2 Responses to “ऑकलैंड के राक्षस भारत आओ”

  1. Sant Prasad Gupta Says:

    एक राक्षस है अभी भी

  2. neeraj naruka Says:

    lage raho muna bhai kabhi to unhen akl aayegi

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