जनता कुछ नहीं भूलती है…!

Courtesy: fineartamerica.com

एक फिकरा बड़ा प्रचलित है कि आम जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर होती है. वह इतिहास तो क्या, कल-परसों गुजरी घटना को भी याद नहीं रखती. सियासतदानों ने इस फिकरे को कई बार अमली जामा पहनाया है. सियासती काठ की हांडी इस मुहावरे पर अनेक बार चढ़ी और बहुतेरे सफल रही है.

यह चाहे जितनी बार भी सफल हो गई हो, महज इत्तफाक की बात है. मुगालते में हैं वे लोग जो इस कहावत को अपनी जमीन मानकर रोटियां सेंकते रहे हैं. अबतक उनकी सारी कोशिशें केवल सुनारी चोट थी, एक लोहार की तरह चोट करना केवल आम जनता के वश की बात है. बिहार विधानसभा चुनाव में किसी एक पार्टी की ऐतिहासिक जीत और विपक्षियों की करारी हार जनता की लोहारी चोट का लेटेस्ट एपिसोड है.

एक्सपर्ट्स इस जीत को अनेक फैक्टर से प्रभावित मानते हैं. मसलन, वर्तमान सरकार द्वारा किये गए जनोपयोगी कार्य, जनता में जागरूकता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार में कमी, अपराध पर अंकुश आदि. कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि ये सारे कारक किसी को भी जीत दिला सकते हैं. मगर, एक बात जो विशेषज्ञों ने नहीं कही (शायद कहने का साहस नहीं हो पाया) वह है बिहार का अतीत और वहां की जनता की याददाश्त.

‘बिहारी’ शब्द एक ‘स्लैंग’ (slang – भद्दी गाली) के तौर पर प्रचलित है, मगर इस शब्द को बोलने वाले इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि बिहारी बड़े क्रिएटिव होते हैं. भले ही मन में ये बात कहते हैं, मगर कहते हैं. क्रिएटिव बिहारियों के दमखम का एक एग्जाम्पल है बिहार विधानसभा चुनाव में किसी एक पार्टी की ऐतिहासिक जीत और विपक्षियों की करारी हार.

अगर जनता की याददाश्त कमजोर होती तो आज बिहार में वही सरकार नहीं होती. वर्तमान सरकार के काम को चाहे जितना पसंद किया गया हो, चाहे जितना सराहा गया हो मगर आम अवाम को इस सरकार से कहीं ज्यादा पिछली सरकार के काम ज्यादा याद रहे हैं. और, पिछली सरकार के कामों को गिनाने आवश्यकता यहां नहीं है, जगजाहिर है.

Dance of Change...Courtesy pabha.com

जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती है, इस बात को वर्तमान केंद्र सरकार, जो मनमोहनिक्स (भारत की नई अर्थव्यस्था) की पैरोकार है, खूब समझ में आ चुका है. आखिर 2जी घोटाले में जेपीसी (ज्वायंट पार्लियामेंट्री कमिटी – संयुक्त संसदीय समिति) के गठन के लिए केंद्र सरकार तैयार क्यों नहीं है? क्योंकि वह जान गई है कि जनता को सब कुछ याद रहता है. इस घोटाले की जांच के लिए जब जेपीसी काम करेगी तो उस पर उनका वश नहीं चलेगा और कई चेहरे नकाबजुदा हो जायेंगे. सरकार की मिटटी पलीद तो होगी ही, अगले लोकसभा चुनाव में लज्जाजनक हार का सामना करना पड़ेगा, वर्तमान केंद्र सरकार को बोफोर्स तोप घोटाले के बाद का चुनावी हश्र अच्छी तरह याद है.

दरअसल देश में कई सामाजार्थिक कई बदलाव आए लेकिन राजनीतिक बदलाव, एक पार्टी की मनोपली (monopoly) से गठबंधन की राजनीति का सफ़र, केवल संक्रमण की प्रक्रिया से गुजर कर रह गई. क्योंकि तब ख़ास अवाम यह मानती रही थी कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है. बिहार से उठी बदलाव की बयार अर्थात जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती है, केंद्र तक पहुँच चुकी है. इस सकारात्मक बदलाव का गवाह समय तो होगा ही, आप भी होंगे.

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One Response to “जनता कुछ नहीं भूलती है…!”

  1. रवि कुमार Says:

    बेहतर…
    जनता के नाम पर…सभी के अपने-अपने गणित हैं….

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