घोघो रानी कितना पानी!

फ़िर छिड़ी बात, बात फूलों की. चांद है या बारात फूलों की

फूल के हार, फूल के गजरे. रात फूलों की, बात फूलों की

सन ’82 में बनी फ़िल्म ‘बाज़ार’ का यह लोकप्रिय गाना आजकल दिल्लीवासियों की ज़ुबां पर खूब चस्पा हो रहा है, मगर एक ‘पैरोडी’ के रुप में. यह पैरोडी कुछ यूं है:

फ़िर  छिड़ी  बात बारिश  की, फ़िर  लगी  लड़ी  बारिश  की.

क्य़ा बताएं बात बारिश की, दिन है बारिश की, रात है बारिश की

Painting by Clifford Elgin, Courtesy cliffordelgin.com

दरअसल, गांव-देहात-कस्बों में प्रचलित सवाल-जवाब का एक खेल ‘घोघो रानी कितना पानी’ आज दिल्ली के हालात पर बिलकुल मुफ़ीद साबित हो रही है. अब दिल्ली वाले भी क्या करें, बारिश ही इतनी हो रही है कि हर चीज अस्त-व्यस्त हो गई है. घर से निकलो तो भींगते हुए, घर आओ तो भींगते हुए. बारिश के कारण ‘फ़ास्ट मूविंग गुड्स’ की कीमत सातवें आसमान से ऊपर वाली आसमान पर पहुंच गई है (सातवीं के बाद आठवीं आसमान भी जरूर होती होगी. नहीं होती है, तो आज की बेचैन जिंदगी, महंगाई, नैतिक पतन और भ्रष्टाचार के के निरुपण के लिए आठवें आसमान का फ़िकरा गढ़ा जाना बहुत जरूरी है). बहरहाल अपनी-अपनी बोझिल रूटीन लाईफ़ में दिल्लीवासी इस पैरोडी से ही अपना मनोरंजन कर रहे हैं. कभी इस बारिश को सुहाना मौसम कहते हुए तो कभी इसको कोसते हुए. और करें भी तो क्या, बारिश पर तो उनका जोर है नहीं कि रोक दें.

मगर जो इस बारिश को सबसे अधिक कोस रहे हैं, वे हैं, कॉमनवेल्थ गेम्स के संयोजक और संरक्षक. उनके लिए तो यह बारिश फ़िल्म का वह विलेन बन गया है, जिसकी करतूतों को देखकर सबसे अधिक गालियां मिलती हैं. बरखा बैरन थम नहीं रही है, काम समय पर पूरा हो नहीं पा रहा और गेम्स शुरु होने में महज गिनती के चंद दिन बाकी हैं. ऊपर से जो काम, जैसे-तैसे, पूरा हो भी गया, बारिश के गीलेपन और जमीन के धंसने से धराशायी होना शुरु हो गया है.

इस बारिश को कोसने वालों मे दिल्ली की मुख्यमंत्री भी शामिल हैं. उनका नारा ‘अपनी ‘दिल्ली-स्वच्छ दिल्ली’ मटियामेट हो चुका है. कई इलाके पानी में डूबे हुए हैं. दिल्ली कई जल-निकासी व्यवस्था ठप पड़ गई है. सप्ताहों पहले से यमुना का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर से बह रहा है. ‘दिल्ली अब डूबी, कि तब डूबी’ वाली हालत को मीडिया ने इस कदर हाईलाईट किया है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री के साथ-साथ पूरा देश सांसत में है.

हालात इतने गंभीर भी नहीं है जितना कि उछाला गया है, मगर आज हर एक को दिन में तीन-चार दफ़ा दिल्ली से बाहर रहने वालों अभिभावकों, यार-दोस्तों और शुभचिंतकों के फ़ोन और मेल आ रहे हैं कि ’भई, आज दिल्ली का क्या हाल है, आप ठीक-ठाक तो हो न…मालूम हुआ है कि फ़लां-फ़लां जगह बाढ़ में डूबा हुआ है, आदि-आदि’.

डेंगू का कहर

Dengue Mosquito, Courtesy stumbleupon.com

ऊपर से डेंगू का कहर कयामत बरपाने की शक्ल में सामने आ चुका है. डेंगू के मच्छर दिनोंदिन सुरसा के मुंह की तरह फ़ैलते जा रहे हैं. अभी से सरकारी अस्पताल और प्राईवेट क्लिनिक के वार्ड डेंगू के मरीजों से अटे पड़े हैं. गैर-सरकारी दावा तो यह कि अब मरीजों को इलाज के लिए इन जगहों पर रखने की जगह नहीं है. लोग अपने मरीजों को अपने घर पर ही किसी तरह से एडजस्ट कर रहे हैं.

दिल्ली के लोगों के जेहन में डेंगू का डर इस कदर समा गया हुआ है कि किसी को कोई मामूली बरसाती कीड़ा भी काट लेता है, तो उसका दिल जोर से धड़कता है कि ये जरूर डेंगू का मच्छर था. फ़िर गुजरने वालों क्षणों-मिनटों-घंटो और दिनों को वह अपने शरीर पर इस बीमारी के लक्षण ढूंढ़ने में लगाए जा रहा है.

ये हालात अभी के हैं, जबकि बारिश बंद नहीं हुआ है. दिल्ली में डेंगू तब विकराल रुप लेती है, जब पानी बरसना बंद हो जाता है. गड्ढे-नाली, ताल-तलैयों में ताजा पानी स्थिर हो जाता है, तब इस रोग के वाहक मच्छर अपनी प्रजनन-शक्ति का कमाल दिखाते हैं (डेंगू के वाहक मच्छर गंदे पानी में नहीं पनपते हैं). अक्टूबर-नवंबर-दिसम्बर में इस रोग का क्लाईमेक्स सामने आता है. तब एकबार फ़िर, इस बारिश को कोसा जाएगा.

सही भी है. और किसे कोसें? सारा किया-धरा तो अपना ही है. खुद को कोस सकते नहीं. विकास की अंधी दौड़ के नाम पर सारा सुख तो हमें चाहिए ही चाहिए. यह मानने में अब किसी को गुरेज नहीं है कि मौसम में विश्वव्यापी बदलाव आ चुका है. इसका एक नमूना भर है यह बारिश, बाढ़ और डेंगू. दिल्ली में बारिश की जरुरत नहीं है, लेकिन बारिश तो यहीं होगी. पूर्वी य़ूपी-बिहार में भरपूर बारिश चाहिए तो वहां खेत सूखे पड़े है. तो आईए, एकबार फ़िर कोसते हैं बारिश को!

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One Response to “घोघो रानी कितना पानी!”

  1. Alok Says:

    बात आपने बिलकुल पते की है. दिल्ली मेरी जान, जो दिल्ली का लड्डू खाए वो पछताए, जो ना खाए वो भी पछताए वाली कहावत यहाँ पे बिलकुल सटीक बैठती है.

    कहने को ये चकाचौंध का शहर है पर अंदरूनी हकीकत कुछ और है, जो अब जा के दिख रहा है. इसे घोटालों का शहर कहें या कुड़े का, दोनों बिल्कुल ठीक होगा…

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