भूगोल का आधुनिक इतिहास Recent History of Geography

Recent History of Geography

हर बदलाव-हर परिवर्तन का कारण “होमो सेपियंस यानि बुद्धिमान मानव”

आपने इतिहास भी पढ़ा होगा और भूगोल भी. आपमें से बहुत लोगों ने भूगोल का इतिहास भी पढ़ा होगा. इन दोनों सब्जेक्ट की एक सबसे बड़ी खासियत क्या है? जी हां, इनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनमे दर्ज तथ्य और सूचनाएं किन्हीं अपवाद कारणों से ही बदलती हैं. चूंकि इतिहास में नए-नए, जैसे- क्लासिक, इंपीरियलिज्म, मार्क्ससिस्ट, सब-अलटर्न, मॉडर्निज्म, पोस्ट मॉडर्निज्म आदि नजरिये से हुए नए-नए शोध होते रहते हैं, इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्याएं बदलती रहती हैं या बदलती रही हैं. जरा गौर कीजियेगा, ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्याएं बदलती हैं, ऐतिहासिक घटनाएं या तथ्य नहीं. जो थोड़े-बहुत बदलाव आते भी हैं, तो वे नए पुरातात्विक उत्खनन और खोज का परिणाम होती हैं. इसमें भी केवल नए ऐतिहासिक तथ्य जुड़ते हैं, बदलते नहीं.

दूसरी ओर, एक विषय के रूप में भूगोल इतिहास से ज्यादा विश्वसनीय माना गया है. क्योंकि, इसमें दी जाने वाली सूचनाएं या तो कभी नहीं बदलतीं, या बहुत धीरे-धीरे बदलती हैं. और, जब तक वे बदलती हैं, तब तक कई पीढियां और सदियां बीत चुकी होती हैं. दूसरा, इतिहास की तरह इस विषय के साथ व्याख्या संबंधी विवाद भी नहीं जुड़े होते (शायद यही कारण है कि यह एक बोरिंग विषय माना जाता है). लेकिन, मुद्दे और पते कि बात जो मैं कहना चाहता हूं, वह है “पिछले कुछ दशकों में यह परिदृश्य अचानक बदल गया है. भूगोल की किताबों में दर्ज सूचनाएं तेजी से बदलने लगी हैं और उनमें शायद ही कोई ऐसी हों, जिन पर कोई न कोई विवाद न खड़ा हुआ हो.”

मैं आपका ध्यान एक विशेष वस्तुस्थिति तरफ की खींचना चाहूंगा कि आज भूगोल के तथ्यों और तस्वीरों में जो बदलाव दिख रहा रहा है. वह मात्र पिछली 3-4 सदियों के दौरान मानवीय गतिविधियों और क्रियाकलापों का परिणाम है. यानि, हर बदलाव-हर परिवर्तन के लिए एक ही कारण है- हम मानव.

अपनी नॉलेज और पर्सपेक्टिव को बदल लें!!!

जरा गौर फरमाइए और कल्पना कीजिये! अगर कोई आपसे कहे कि महान भारत की महान नदी गंगा हिमालय की गंगोत्री से निकल कर उत्तरांचल और उत्तर प्रदेश से बहती हुई, बिहार-बंगाल की सीमा पर स्थित फरक्का बराज पर ख़त्म हो जाती है, तो आपको कैसा लगेगा. उम्मीद है, आपका रिएक्शन होगा कि ऐसा कैसे हो सकता है? गंगा नदी तो गंगोत्री से निकल कर बंगाल की खाड़ी में समा जाती है. जब मेरे एक मित्र ने मुझसे ऐसा कहा तो मैंने भी यही रिएक्ट किया था. आखिर, मैं यह तथ्य चौथी-पांचवीं क्लास से पढ़ता आ रहा हूं, लिहाजा मुझे अपने जेनरल नॉलेज पर पूरा भरोसा था. लेकिन मुझे लगता है कि मेरे इस एक पंक्ति के सर्व-साधारण सामान्य ज्ञान पर शुबहा करना शुरू कर देना चाहिए!

‘भारतीय संस्कृति की पालना’ (Cradle of Indian Civilization) कही जानेवाली पतित-पावनी गंगा गंगोत्री से निकल कर बंगाल की खाड़ी में समा जाती है – चौथी-पांचवीं क्लास में दी जाने वाली एक पंक्ति की यह जानकारी आज एक अलग चैप्टर की मांग करने लगी है. गंगा नदी पर बने विभिन्न डैम और बराजों के कारण गंगा की धारा सिकुड़ती जा रही है. फरक्का बराज के बाद तो यह एकदम पतली और क्षीण-सी हो गई है. गर्मियों में बाढ़ के मौसम से पहले, जब नदी मार्ग जगह-जगह सूखी नजर आती है, तो यह एक छाड़न नदी मात्र नजर आती है.

कुछ ऐसी ही हालत गंगोत्री की भी है. गंगा की मौजूदा यात्रा में भौगोलिक दृष्टि से अब गंगोत्री की कोई खास जगह नहीं रह गई है क्योंकि इस नदी का उद्गम स्थल गंगोत्री से करीब सत्रह किलोमीटर उत्तर जा चुका है. जिस दर से गंगा अपना स्वरुप बदलती जा रही है, मुझे तो लगता है कि अगले 50 सालों में महज एक बरसाती नाला बनकर न रह जाए. संभवतया यह गंगा से जुड़े शास्त्रीय विवाद का अगला चरण होगा, जिसके बारे में ठंडे दिमाग से सोचने का समय शायद अभी नहीं तो 20 या 30 साल बाद करना ही होगा.

तो साथियों, अपनी नॉलेज और पर्सपेक्टिव को बदलने को हो जाइए तैयार, और देखते जाइए उन वैश्विक बदलावों को जिसके साक्षी बनेगें- आप और हम!!!

और हां, इससे मिलती-जुलती एक दुर्घटना यमुना नदी के साथ भी हो सकती है, जिसका 95 प्रतिशत पानी दिल्ली-हरियाणा के खेत सींचने के लिए निकाल लेने का फैसला 1950 के दशक में ही ले लिया गया था. नतीजन गर्मियों में गुड़गांव-दिल्ली से लेकर आगरा तक भयंकर पेयजल संकट के रूप में देखने को मिल रहा है, लेकिन 2021 तक, जब राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश (एनसीआर) 10 करोड़ के आसपास की घनी बसावट वाली जगह बन चुका होगा, नोएडा से आगरा तक छोटे-छोटे शहरों की कतार खड़ी होगी और दिल्ली-मुंबई फ्रेट कॉरिडोर के इर्द-गिर्द ‘इंडिया शाइनिंग’ के शाइनिंग औद्योगिक इलाके विकसित हो रहे होंगे, तब यमुना नदी का एक भयंकर बदबूदार नाले में बदलना किसी पर्यावरण दुर्घटना जैसा नजर आए, तो अस्वाभाविक नहीं होगा. क्या तब हम ‘फील गुड’ कर पाएंगे.

वैसे मुझे तो यह लगता है कि यम की बेटी यमुना अगर हरियाणा-दिल्ली के लिए ऑफिशियल नाला जैसी भी बची रह गई, तो बहुत बड़ी बात होगी…

अरल सागर या अरल डेजर्ट

दुनिया के पैमाने पर हो रहे भौगोलिक बदलावों की स्थिति और भी विकट है. इधर के दशकों में मानवीय और प्राकृतिक गतिविधियां देश-दुनिया का खाका इतनी तेजी से बदलने लगी हैं कि एक शास्त्र के रूप में भूगोल के लिए अपना वजूद बचाना मुश्किल हो गया है. नक्शों में दर्ज नदी, पहाड़, जंगल, रेगिस्तान जैसी भौगोलिक संरचनाएं देखते-देखते कुछ और ही चीजों में बदलती जा रही हैं. आम तौर पर इनका असर दिल बैठाने वाला है.

दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील अरल सागर के बारे में इस हफ्ते आई खबर इक्कीसवीं सदी में नक्शानवीसी की बेचारगी की तरफ इशारा करती है. 1940 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार ने मध्य एशिया के मैदानों में कपास उगाने के लिए अरल सागर में गिरनेवाली नदियों की धारा रोक कर नहरें निकालने का सिलसिला शुरू किया था. आज अरल सागर के पेटे (Catchment Area) में रेत में धंसे जहाजों के इर्दगिर्द दूर-दूर तक ऊंट यानी रेगिस्तान के जहाज चरते नजर आ रहे हैं.

1960 के दशक तक प्रकृति अपने स्वाभाविक चक्र के तहत किसी तरह अरल सागर को हो रहे इस नुकसान की भरपाई करती रही. लेकिन फिर यह चक्र टूट गया और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील सिकुड़ने लगी. उपग्रहों द्वारा लिए गए चित्रों की तुलना करने से पता चलता है कि पिछले चार दशकों में इसका जल क्षेत्र सिकुड़ कर मात्र 10 प्रतिशत रह गया है. बाकी 90 प्रतिशत इलाकों में बची है दूर-दूर तक पसरी हुई नमकीन रेत, जहां इक्का-दुक्का कंटीली झाडि़यां उगती हैं और सऊदी अरब के रेगिस्तानों की तरह अंधड़ चलते हैं.

विडम्बनापूर्ण है ये सब! ये सब किया किसने? हमने और आपने ही, न!! कितने स्वार्थी, लालची और अनियंत्रित हैं हम मानव!!!

हालांकि बहुत कुछ जो बिगड़ चुका है, उसे फिर से बनाया या वापस तो नहीं लाया जा सकता, पर क्या जो बचा है उसे बचाया और सुधारा भी नहीं जा सकता!!! सोचिये…सोचिये…और कुछ कंक्रीट स्टेप उठाइये…कंक्रीट के जंगल नहीं.

बचाव और सुधार का यह काम केवल सरकार, समाज, समुदाय या गुटों का नहीं बल्कि हर आदमी को अपने-अपने स्तर पर अभी से शुरू कर देना होगा….नहीं तो अपने स्कूल-कॉलेज के सिलेबस और किताबों में एक चैप्टर जोड़ने की तैयारी कर लीजिये- “भूगोल का आधुनिक इतिहास” (Recent History of Geography). क्या पता? यह चैप्टर भी जोड़ने का समय प्रकृति शायद हमें न दे!!!

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