गुलाम भारत की निशानी राष्ट्रपति भवन और पार्लियामेंट हाउस

Gulam Bharat ki Nishani Rashtrapati Bhavan aur Parliament House

गुलाम भारत की निशानी राष्ट्रपति भवन और पार्लियामेंट हाउस
को बम से उड़ा दें तो क्या गलत होगा!!!

मध्य प्रदेश की गौरवशाली नगरी भोपाल में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट के दीक्षांत समारोह (Convocation Ceremony) में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जो किया वह कितना सही और गलत है, इसका फैसला बड़ा मुश्किल है. क्योंकि मुद्दा ऐसा है कि लोग कम-से-कम दो धड़ों में बंट ही जायेंगे, साथ ही और भी कई गुट हो सकते हैं. पहले घटना जान लीजिये. पर्यावरण मंत्री को इस संस्था के दीक्षांत समारोह के दौरान एक गाउन पहनाया गया क्योंकि यह एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक परम्परा है. यह हमारे (परा)स्नातक यानि स्कॉलर होने की अशाब्दिक घोषणा करता है और इसे राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवी होने का एक अघोषित सर्टिफिकेट समझा जाता है.

पर्यावरण मंत्री को पता नहीं इस गाउन से क्या खुन्नस थी, उन्होंने इस गाउन को उतार दिया. इसे उतारने की जो दलील उन्होंने दी वह बड़ा रोचक है. उन्होंने कहा कि यह परंपरा उन्हें गुलामी (अंग्रेजी शासन) के बर्बर जमाने की याद दिलाता है. उन्होंने कहा ‘मुझे अब तक यह समझ में नहीं आया कि आजादी के 60 साल बाद भी हम गुलामी के बर्बर जमाने की निशानियों से क्यों चिपके हुए हैं. क्या सामान्य ड्रेस में कन्वोकेशन मुमकिन नहीं है?’ ऐसा कहते हुए पर्यावरण मंत्री ने वहीं मंच पर अपना गाउन उतार दिया. चूंकि मामला सत्तासीन पर्यावरण मंत्री का था और मौका हंसी-खुशी का था, लिहाजा समय की नजाकत को देखते हुए वहां मौजूद भीड़ ने उनके इस कार्य का स्वागत तालियों से करना ही मुनासिब समझा. वैसे लगभग सभी के चेहरों पर नागवारी के चिन्ह साफ़-साफ़ झलक रहे थे.

मैं नहीं जानता इस घटना पर आपके विचार क्या हैं? लेकिन मेरा मानना है कि एक राष्ट्र के जिम्मेदार और माननीय पर्यावरण मंत्री का यह कृत्य एक स्वस्थ शैक्षणिक परंपरा का सरासर अपमान है. दीक्षांत समारोह की यह परंपरा वर्षों से यूं ही नहीं चली आ रही है. यह इसलिए सातत्य कायम किए हुए है क्योंकि इसमें बौद्धिक गरिमा के साथ-साथ सामाजिक सम्मान की अक्षुण्ण भावना समाहित है. इसे हम भारतीयों ने तभी अपनाया है, जब हमें इसमें कुछ ‘पॉजिटिव’ नजर आया. प्रश्न उठता है, आखिर यह पॉजिटिव क्या था?

पहला, जब इस परंपरा की शुरुआत हुई थी तब इस देश के लोग वंश, जाति, समुदाय, धर्म आदि की कट्टरता की रहनुमाई करते थे. अमीर-गरीब, उंच-नीच और लिंगभेद तो था ही. तब इस परंपरा ने इन सभी बंटे हुए सामाजिक धड़ों और लोगों को एक मंच, एक इंटेलेक्चुअल प्लेटफॉर्म पर बिना भेदभाव के एक साथ खड़ा होने एक समान शैक्षणिक-सामाजिक आयाम दिया. इसके पीछे मंशा केवल और केवल यह थी कि यदि समाज यह भावी बुद्धिजीवी आनेवाले कल में कंधे-से-कंधे मिलाकर एकसाथ काम करेंगे. सामाजिक-सांस्कृतिक-राष्ट्रीय उन्नयन में सहभागी बनेंगे और लोगों को दिशा-निर्देशित कर सकेंगे, जिससे सभी का चतुर्दिक और सार्वजनीन विकास होगा. दूसरा, गाउन पहनकर उपाधि ग्रहण करना आत्मविश्वास उत्पन्न करता था. तीसरा, स्नातक को गुणी और ज्ञानवान होने का बोध देता था और उसे विशिष्ट बनाता था. यह बोध और भाव तब भी यही था और आज भी यही है.

शायद हमारे पर्यावरण मंत्री जी दीक्षांत समारोह के अवसर पर गाउन पहनकर एकसाथ खड़े होने के इन उद्देश्यों से भलीभांति नावाकिफ थे. तभी तो उन्हें यह परंपरा उन्हें गुलामी के बर्बर जमाने की निशानी लगती है.

देर आयद दुरुस्त आयद!!!

अब एक बड़ा सवाल उठता है कि हमारे देश में तो अंग्रेजी शासन के गुलामी के बर्बर जमाने की कई निशानियां माजूद हैं, तो क्यों न उन सभी निशानियों को जड़ समेत उखाड़ फेंका जाए? मसलन, गेटवे ऑफ़ इंडिया- मुंबई, इंडिया गेट- नई दिल्ली, राष्ट्रपति भवन- नई दिल्ली, पार्लियामेंट हाउस- नई दिल्ली आदि जैसी अनगिनत स्मारक और इमारतें गुलामी के बर्बर जमाने में ही बनी थी. हमारे पर्यावरण मंत्री को तो चाहिए कि जैसे गाउन को उतारकर फेंक दिया वैसे ही गुलामी के बर्बर जमाने की इन बड़ी-बड़ी निशानियों को बम से उड़वा दें. जैसा बयान उन्होंने दिया है उससे कोई भी कह सकता है, उनकी दृष्टि में गुलामी की निशानियों को बम से उड़ा देना कतई गलत नहीं होगा. वे अभी सत्तासीन हैं, उनके पास राजनीतिक शक्ति और पहुंच है. वे चाहें तो इस मुद्दे पर एक विधेयक (Bill) पास करवा सकते हैं और सांविधानिक नियम बनवा सकते हैं. दक्षिणपंथी पार्टियों सहित वामदल तो इस विधेयक को हाथोंहाथ समर्थन देंगें. आखिर मामला गुलामी के बर्बर ज़माने की निशानियों को नष्ट करने का होगा, न! दूसरे, राष्ट्रवाद किसी पार्टी विशेष की तो बपौती है, नहीं!!

पर्यावरण मंत्री को लगता बुद्धि देर से आई (वाकई में देर से ही आई होगी!!!) क्योंकि जब वे पार्लियामेंट हाउस गए होंगे तब उन्हें यह विचार क्यों नहीं आया? जब वे राष्ट्रपति से मिलने गए होंगे उस समय उन्हें यह धांसू आइडिया क्यों नहीं आया?? अब भी देर नहीं हुई है. वे एक मुहिम चलाएं कि पार्लियामेंट हाउस जाना और वहां काम करना (वहां काम होता भी कितना और कितने दिन है, यह सबको पता है!!!) गुलामी के बर्बर ज़माने की निशानियों और परम्पराओं को पुष्ट कर करना होगा. लगे हाथ, वे राष्ट्रपति को सलाह दे ही डालें कि उनका जो निवास है, उसे वे छोड़ दें, क्योंकि वह भारत को गुलाम बनाने वाले बर्बर वायसरायों का षड्यंत्र केंद्र था. दूसरे, इसकी डिजाइन और निर्माण भी एक अंग्रेज एडविन ल्यूटिएंस ने ही किया था.

अब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश जी को और क्या-क्या सलाह दें. केवल इतना कहेंगे कि सस्ती लोकप्रियता बटोरने के चक्कर में दिमाग तो ताक पर नहीं रखें. पर्यावरण को यूं प्रदूषित न करें, जो पहले ही काफी प्रदूषित है. औचित्य और अनौचित्य के फर्क को समझें. एक स्वस्थ परंपरा का सम्मान करें, उसका पोषण करें, चाहे वह किसी देश की हो, चाहे कहीं से आई हो और कभी भी आई हो.

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7 Responses to “गुलाम भारत की निशानी राष्ट्रपति भवन और पार्लियामेंट हाउस”

  1. ehtesham Says:

    How illogical and irrational of Jairam Ramesh. Perhaps, he does not know that even the Parliamentary System in India is a borrowing of Britain. Then, he should depart from Indian politics. Shouldn’t he? Coz it would pretentiously remind him of British exploitation on Indians. What a joke…
    If he departs, I would say, I would have one benefit….Ask me how? Coz, then I would not have to see such a fool in my governance or political system. Ha ha ha…

  2. Abhishek Says:

    हमारे माननीय मंत्री जी बिना कुछ सोचे समझे अपनी बचकानी हरकतों से मीडिया का ध्यान अपनी और आकर्षित कर ही लेते हैं. कन्वोकेशन सेरेमनी में उनका गाउन उतारकर फेंकना भी इसी का एक हिस्सा है. और यह कोई पहली बार नहीं है इससे पहले भी बी. टी. बैंगन और पर्यावरण समझौते को लेकर उनकी काफी किरकिरी हो चुकी है. लेकिन कहते हैं न कि” जब सैयां भये कोतवाल तब डर कहे का” बस वही हाल इनका है. पर्यावरण मंत्री हैं लेकिन पर्यावरण कि कितनी चिंता करते हैं ये तो वही जाने, हम तो इतना जानते हैं किसी दिन वो इंडिया गेट या राष्ट्रपति भवन के लिए भी इस तरह के शब्दों का प्रयोग न कर दे, आपकी इस बात में वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए ये आशंका तो व्यक्त की ही जा सकती है.

    • tathakathit Says:

      …तो आप भी सहमत हैं, जो विचार मेरे जेहन में उभरे. शुक्रिया अभिषेक.
      सही कहा आपने, वर्तमान पर्यावरण मंत्री काफी उतावले लग रहे हैं…उनसे जुड़ी विगत घटनाओं से तो ऐसा ही लगता है. शायद खुद को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं!!!

  3. Syed zia Says:

    You are right dear we stepping in to the era of new imperialism. Some one rightly says(बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं, अजीब रस्म चली है दुआ न मांगे कोई) I am not against the modernization and technoligical advancement, but i categorically refuse the idea of adopting western life style. We the Indian are having such a rich culture then why should we rely on others. Europeans are trying to make us slave but this time they will not rule our country as they did before. This time they will import their thoughts,their culture and civilization. It is our duty to promote our culture to defend our culture, inorder to overthrow the hidden illegitimate rulers.

  4. ambarish rai Says:

    we should get ready ourselves to accept the changes. I think, this is simple to keep yourself simple…lead the world through the relevant ideas, new experiments and creativity. This issue is not debatable…though they have double standard of life but if they speak against colonialism we should congratulate them and try to force them for action according to their speech.
    Independence was like a transfer of power from British elite to Indian elite, the ruling class, now Indian masses need a genuine independence against the colonial mindset

  5. satya prakash Says:

    a right question has been thrown before us, the public of India. what ideas and paramparas borrowed by the britains should be retained and upto what extent, is a nagging question before us. Summer vacation, specially in highcourts and supreme court is the largest symbol of english rule over India, but it has been never questioned even that we have justice like Hon’ble Shailendra kumar who dare to state the Hon CJI as snake without poison. How illogical it is to be spare from work when we have already a vast hip of pending cases. I am offering Jairam a very nagging question in which he can contribute with the help of his Counterpart Mr. Virappa Moily. Can’t it be a positive starting for the struggle of being free from british Oupniveshik remainings.

  6. sunita Says:

    s

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