लिव-इन-रिश्ते और कानून (Live-in-Relationships and Law)

लिव-इन-रिश्ते और कानून (Live-in-Relationships and Law)

हाल ही में, एक अपील की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन-रिलेशनशिप पर जो टिप्पणी की है उससे हमारे समाज में इस मसले पर चल रही बहस एक नए दौर में पहुंच गई है। चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन, जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस बी.एस. चौहान की तीन सदस्यीय बेंच ने टिप्पणी की है कि अगर दो वयस्क व्यक्ति आपसी रजामंदी से शादी के बगैर साथ रहते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह अपराध नहीं है। साथ रहना जीवन का अधिकार है।

माननीय सुप्रीम कोर्ट की यह टिपण्णी निस्संदेह लोकतंत्र और व्यक्ति-स्वतंत्रता की भावना और निष्ठा को एक नयी ऊंचाई देने वाला है. यह मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 21 का दायरा और ज्यादा बड़ा कर देता है. भारतीय संविधान के इस अनुच्छेद का आपने अगर अध्ययन किया है तो आप आसानी से कह सकते हैं कि लिव-इन-रिलेशनशिप व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के मूलभूत अधिकार को एक नया आयाम देता है. सुप्रीम कोर्ट की इस टिपण्णी के अनुसार, शादी के पहले सेक्स संबंध कायम करना कोई अपराध नहीं है। देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो शादी से पहले सेक्स संबंध की मनाही करता हो। आपको याद होगा, इससे पहले जनवरी 2008 में जस्टिस अरिजीत पसायत और जस्टिस पी. सतशिवम की बेंच ने लंबी अवधि के लिव-इन रिश्ते को शादी के बराबर मानने का फैसला दिया था।

विवाद पति-पत्नी बनाम रखैल का

मगर लाख टके का सवाल यह उठता है कि लिव-इन-रिलेशनशिप की कानूनी परिभाषा क्या है और इसमें कानूनी बल कितना है? क्योंकि, लिव-इन-रिलेशनशिप को कानूनन जायज ठहराना और उसे कानून की धाराओं के अनुसार साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं. दूसरे, सामान्य भारतीयों की मानसिकता को समझे बिना इसकी वैधता पर हमेशा प्रश्न चिन्ह लगा रहेगा. आप अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारा समाज, कम से कम, आज भी शादी-विवाह जैसे मामलों में कितनी संकीर्ण और रुढ़िवादी सोच रखता है. जो संबंध समाज के सामने नहीं लाया गया और उसे सामाजिक मंजूरी नहीं मिली तो समाज की नज़रों में नाजायज और अवैध संबंध है. अब कोर्ट चाहे इसे जितना सही ठहरा ले, समाज लिव-इन-रिलेशनशिप के तथाकथित पति-पत्नी को उसका माकूल सम्मान नहीं देगा. वह लड़की या औरत रखैल की तरह देखी, समझी और जानी जाएगी.

चुनौतियों का नया सूरज

वैसे तो लिव-इन रिलेशनशिप की शुरुआत महानगरों के शिक्षित और आर्थिक तौर पर स्वतंत्र ऐसे लोगों ने की थी जो विवाह संस्था की जकड़ से छुटकारा चाहते थे। पर अगर इस रिश्ते पर भी धीरे-धीरे विवाह संस्था वाले कानून ही लागू होने लगेंगे तो जिन जकड़नों से लिव-इन रिलेशनशिप के जरिए मुक्ति चाही गई थी, वह मकसद ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में शादी और लिव-इन रिश्ते में कोई फर्क ही नहीं रह जाएगा। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि कहीं इससे द्वि-विवाह को प्रोत्साहन न मिलने लगे। एक सवाल यह है कि यदि बाल-बच्चों वाला शादीशुदा पुरुष और एक सिंगल महिला लिव-इन रिश्ते में रहते हैं तो ऐसी स्थिति में पहली पत्नी की क्या हैसियत होगी? ऐसे में महिलाओं की बराबरी और मुक्ति की घोषणा से शुरू हुए इस रिश्ते का महिला विरोधी रूप उभर कर सामने आ जाएगा।

पर इस संबंध में देखने वाली बात यह है कि देश में उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक हैसियत तेजी से बदल रही है। वे उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं और लगभग हर क्षेत्र में कामयाब हो रही हैं। जाहिर है ऐसी महिलाएं सेक्स, विवाह और परिवार का पुराना ढांचा स्वीकार नहीं करेंगी। भले ही ज्यादातर पुरुष इस बदलाव के साथ सामंजस्य बिठाने में असहज महसूस करें, पर यह तय है कि हमारे समाज में धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष संबंधों में बराबरी आती जाएगी। इस प्रक्रिया को रोक पाना असंभव है। समय की मांग है कि इस पर हायतौबा मचाने के बदले समाज इस सचाई को स्वीकार करे और बदलते समय के अनुसार खुद को भी बदले।

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3 Responses to “लिव-इन-रिश्ते और कानून (Live-in-Relationships and Law)”

  1. Abhishek Says:

    आपने बहुत अच्छे मुद्दे को उठाया है और सभी पहलुओं पर गौर किया है. एक जगह आपने लिखा है कि समाज ऐसे रिश्ते को मान्यता नहीं देगा. ठीक है लेकिन क्या समाज में सारे काम सही होते हैं. हर चीज को देखने के दो नजरिये होते हैं. अब इसे किस नजरिये से देखते हैं ये देखने वाले के ऊपर है.आज कल तो वैसे भी लोग किसी दूसरे को खुश नहीं देख सकते. तो समाज कि बात करना तो बेमानी है लेकिन आपका यह प्रश्न कि अगर कोई शादी शुदा व्यक्ति लिव इन में रहता है तो उसके बीवी बच्चो का क्या होगा. वाकई जायज है. एक मुख्य बात यह है कि कुछ लोग यह सोच रहे होंगे कि इसके लिए कोई क़ानून बना दिया जाये. लेकिन जिस देश में किसी केस की सुनवाई में ही सालों लग जाते हों वहां इस तरह की बात बेकार ही है. अब वक़्त आ गया है कि हम इसे स्वीकार करें लेकिन कैसे ये हमें खुद समझना होगा.

  2. Abhishek Says:

    आपने बहुत अच्छे मुद्दे को उठाया है और सभी पहलुओं पर गौर किया है. एक जगह आपने लिखा है कि समाज ऐसे रिश्ते को मान्यता नहीं देगा. ठीक है लेकिन क्या समाज में सारे काम सही होते हैं. हर चीज को देखने के दो नजरिये होते हैं. अब इसे किस नजरिये से देखते हैं ये देखने वाले के ऊपर है.आज कल तो वैसे भी लोग किसी दूसरे को खुश नहीं देख सकते. तो समाज कि बात करना तो बेमानी है लेकिन आपका यह प्रश्न कि अगर कोई शादी शुदा व्यक्ति लिव इन में रहता है तो उसके बीवी बच्चो का क्या होगा. वाकई जायज है. एक मुख्य बात यह है कि कुछ लोग यह सोच रहे होंगे कि इसके लिए कोई क़ानून बना दिया जाये. लेकिन जिस देश में किसी केस की सुनवाई में ही सालों लग जाते हों वहां इस तरह की बात बेकार ही है. अब वक़्त आ गया है कि हम इसे स्वीकार करें लेकिन कैसे ये हमें खुद समझना होगा.

    • tathakathit Says:

      धन्यवाद अभिषेक,
      मुझे आशा थी कि आपको मेरे विचार अच्छे लगेंगे. जहां तक समाज का नजरिया है, वह तो दोधारी तलवार है. उसने राम, कृष्ण, गांधी तक को बदनाम करने से नहीं छोड़ा है.
      खैर, आप तक मेरी बात समय-समय पर यूं ही पहुंचती रहेगी और आप अपने नजरिये से मुझे अवगत करते रहेंगे.
      आपका
      श्याम

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