जीवमात्र की जीवन-यात्रा का एक आध्यात्मिक रुपक है दीपावली

नवम्बर 5, 2015

महाकाव्य रामायण के अनुसार, प्रकाशपर्व दीपावली भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद उनके अपने घर अयोध्या वापस आने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

लेकिन यह श्रीराम के वनवास के पश्चात अयोध्या वापस आने की केवल शुभ-कथा और त्योहार मात्र नहीं है। यह एक रुपक है, जो महान आध्यात्मिक संदेश देता है।

diwali and spiritualityएक सनातन त्योहार के रुप में दीपावली उजागर करता है कि श्रीराम का वनवास पर जाना एक रूपक है, एक उदाहरण है, जिसे मानवमात्र को आत्मसात करना चाहिए।

यह रुपक कहता है कि यह पृथ्वीलोक जीव (मानव) का अपना घर नहीं है। यहां पर जीव (मानव) को बारम्बार जन्म-मरण की प्रक्रिया से गुजरना है। इस रुप में पृथ्वी पर जीव (मानव) का आना उसका वनवास भोगना है।

इस प्रकार यह पृथ्वीलोक जीव (मानव) का स्वधाम नहीं है। उसका वास्तविक धाम कहीं और है, जो विराट की सत्ता से प्रत्यक्ष संचालित है।

पृथ्वीलोक पर जीव (मानव) का भिन्न-भिन्न योनियों में रूप धारण करना भी उसका निज-स्वरुप नहीं है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब यह पृथ्वीलोक जीव (मानव) का स्वधाम नहीं है, वह विराट की प्रत्यक्षसत्ता से संचालित अपने वास्तविक धाम को कैसे पहुंचेगा? उसे अपने स्वधाम पहुंचने के लिए क्या करना चाहिए?

भारतीय मनीषियों ने इसका उत्तर दशहरा से दीपावली के मध्य में खोजने का निर्देश दिया है। धर्मग्रंथों में उल्लिखित है कि भगवान श्रीराम दशहरा को लंकापति दशानन रावण पर विजय प्राप्त करने के बीसवें दिन अयोध्या आए थे। इस तरह उन्हें अयोध्या आने में 19 दिन लगे थे।

Lord Ram 1तत्वज्ञानियों के अनुसार, ये उन्नीस दिन 19 तत्वों के द्योतक हैं, 19 तत्वों के रुपक हैं। ये है: पंच महाभूत (5), पंच प्राण (5), पंच उप-प्राण (5) (इसमें तंत्रमात्राएं समाहित हैं) और अंतःकरण के चार तत्व (4)।

इन 19 तत्वों का संधान और ज्ञान कर मानव अपने आपको को विराट सत्ता से जोड़ता है।

आध्यात्मिक चिंतकों और तत्वज्ञानियों के अनुसार, यह सारी प्रक्रिया ही जीव (मानव) के समस्त ‘कर्मफल-बंधन से मुक्ति का मार्ग’ है। इसे संपन्न करने के उपरांत ही जीव (मानव) अपने समस्त कर्म संस्कारों को क्षयीभूत करता है और अपने मूल-स्वरुप में आने का प्रयोजन सिद्ध करता है।

उपर्युक्त 19 रुपकों या तत्वों का समाहार है दीपावली, जो प्रकाशमय यानी वास्तविक रुप में ज्ञानमय है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की परिणति दीपावली-स्वरुप है, अनंत सत्ता से मिलन का प्रसन्नता-दिवस है।

अर्थात, मानव अपना वनवास-भोग समाप्त कर अपने स्वधाम वापिस पहुंचता है। यही अवस्था योग में ‘स्वात्म-योग’ कही गयी है। अध्यात्म में यही वास्तविक ‘दीपावली’ है।

http://m.ndtv.com/khabar के “आस्था” सेक्शन में पब्लिश्ड

यंग सी.ए. कम्यूनिटी तय करेगी इस बार के सेंट्रल काउंसिल के इलैक्शन का रुख

अक्टूबर 27, 2015

Ballot-Boxसी.ए. इलैक्शन की घोषणा हो चुकी है, कैंडिडैट भी मैदान में डट गए हैं और हर कोई अपनी जीत का दावा ठोकने में लगा हुआ है। लेकिन अंदर की बात यह है कि इस बार 50,000 वोट्स में जो “मेजर शिफ्ट” अर्थात भारी हलचल होगी, वो यंग ओर नए सी.ए. के रुख से होगी।

गौरतलब है कि इस बार के इलैक्शन में यंग सी.ए. वोटर्स न केवल अपने संख्याबल बल्कि बुद्धिबल और परिपक्वता के कारण एक बहुत बड़ा वर्ग है और निर्णायक भूमिका में है। इस बार यही परिपक्व वर्ग तय करेगा कि कौन सेंट्रल काउंसिल में आयेगा और कौन नहीं!

वाई.एम.ई.सी. ने किया हैं यंग सी.ए. के लिए अहम काम

जाहिर है कि यंग सी.ए. अपने जैसे किसी यंग कैंडिडैट को ही देखना पसंद करेंगे या फिर उस कैंडिडैट को जिसकी यंग सी.ए. के बीच गहरी पैठ हो। सी.ए. में बहुत सारी कमिटियां कार्यरत हैं और अगर इन कमिटियों द्वारा किए गए कार्यों पर नज़र डालें, तो वाई.एम.ई.सी. यानी यंग मेम्बर्स एम्पावर कमिटी (YMEC – Young Members Empowerment Committee), जोकि युवा और नए सी.ए. के लिए कार्यरत है, काफी चर्चा में रही है।

Presentation2कहा तो यहां तक जाता है कि इस कमिटी की बागडोर लेने में पहले कोई भी तैयार नहीं था, किसी भी काउंसिल मेम्बर की रुचि नहीं थी। लेकिन वर्तमान कमिटी चेयरमेन ने इस कमिटी में नई जान फूंक दी है। इतना ही नहीं, जो नए आयाम इस कमिटी के द्वारा स्थापित किए गए हैं, वह आनेवाले सालों के लिए एक बेंचमार्क बन चुके हैं।

यंग सी.ए. प्रोफेशनल को अगर मुख्यधारा में लाने का किसी ने प्रयास किया है, तो वह इसी कमिटी का कार्य है। बहुत सारे यंग और नए-नए सी.ए. से बात करने पर पता चलता है कि वह इस कमिटी के विज़न और कार्यशैली से बहुत अधिक प्रभावित हैं। उन्होंने सी.ए. प्रोफेशन में एक नयापन महसूस किया है, उन्हें एक नई ऊर्जा मिली है। यह बात और है कि इस कमिटी की कार्यशैलियों के खिलाफ अनेक प्रकार के प्रोपगैण्डा भी किये गये हैं, फिजूलखर्ची के भी आरोप लगाये गये हैं।

औरों के पास कहने को कुछ है ही नहीं

लेकिन इन आरोपों का जबाब देते हुए युवा सी.ए. प्रोफेशनल्स का कहना है कि यदि हमारी भलाई में इंस्टिट्यूट के कुछ पैसे खर्च ही हो गये, तो इससे क्या अपराध हो गया। वाई.एम.ई.सी. के अलावे न जाने कितनी कमिटियां हैं, पर और कमिटियों के बारे मैं कोई बात क्यों नही करता है। वास्तव में बात कहने को उनके पास कुछ भी नहीं है।

निर्णायक भूमिका निभाएंगे यंग सी.ए.

निर्णायक भूमिका निभाएंगे यंग सी.ए.

निस्संदेह अगर अगर युवा सी.ए. वर्ग की ऐसी विचारधारा है, तो उसका क्रेडिट इस कमेटी के चेयरमेन और अन्य पदाधिकारियों को ही जाता है। इसी आधार पर यह भी कहा जाना गलत नहीं होगा कि इस इलैक्शन जिसकी चाहे जो मर्जी हो, अगर ये युवा वोटर्स आपके साथ हो तो फिर आपको कोई नहीं पछाड़ सकता।

लिहाजा यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इस बार के सेंट्रल काउंसिल के चुनावों में भी ऐसा ही कुछ समीकरण देखने को मिलेगा। राजनीति चाहे जितनी भी निम्नस्तर की कर ली जाये, लोग चाहे जो मर्जी बोलें पर युवा सी.ए. को बरगलाया नहीं जा सकता है और इस बार के इलैक्शन की दशा और दिशा दोनों यही वर्ग निर्धारित करेगा।

क्या सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में एकबार फिर से शर्मशार होगा सीए प्रोफ़ेशन

अक्टूबर 23, 2015

हमने अपने पिछले लेख में उजागर किया था कि किस तरह सीए इलैक्शन में ओछी राजनीति का खेल खेला जा रहा है। कुछ नामचीन लोगों के इशारों पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति चल रही है। इस शतरंज की बिसात के मोहरे कहीं और बैठे हैं और बिसात कहीं और बिछी हुयी है।

और तो और, इस खेल में सीए प्रोफ़ेशनल के जाने-माने लोगों तक को नहीं बख्शा गया है, सरेआम उन पर कीचड़ उछाला गया है जो कि प्रॉफ़ेशन की गरिमा को बिलकुल शोभा नहीं देता।

ऐसा प्रतीत हो रहा है, कुछ खास लोगों के खिलाफ उनकी छवि को धूमिल करने हेतु सोची-समझी रणनीति के तहत कार्यबद्ध तरीके से कैम्पेन चलाई जा रही है। आश्चर्य होता है कि देश के अतिसम्मानित और गरिमापूर्ण सीए प्रॉफ़ेशन में भी इस तरह की हीन विचारधारा हो सकती है।

बहुत सारे नए तथा पुराने सीए के फ़ेसबुक पेज और ग्रुप्स खंगालने के बाद निचोड़ समझ में आता है कि कोई दीप जैन नामक सीए ही सबसे ज्यादा भ्रांतिया फैला रहे हैं। अगर उनकी टिप्पणियों के ऊपर गौर किया जाए तो सबसे पहले उनका शिकार बने हैं, वे हैं विजय गुप्ता। ऐसा लगता है उनसे तो दीप जैन जी को खास ही प्यार है। और, अब इस कड़ी में कुछ और नए नाम जुड़ गए हैं, ये हैं: अतुल गुप्ता, नवीन गुप्ता, संजीव चौधरी आदि।

कौन-कौन हैं मैदाने-जंग में

Sitting CC Members

Sitting CC Members

गौरतलब है कि नॉर्दर्न रीज़न से सेंट्रल काउंसिल की 6 सीटों के लिए 21 प्रत्याशी भिड़ेंगे, जिनमें वर्तमान सेंट्रल काउंसिल के 6 मेंम्बर्स में से 5 मेंम्बर्स मैदान में है। ये पाँच प्रत्याशी हैं: विजय गुप्ता, जिनकी छवि सीए वर्ग के बीच में काम करने वाले लीडर की छवि है। यंग सीए के बीच उनका अच्छा खासा प्रभाव है तथा ज़्यादातर वह इन राजनीतिक पचड़ों से दूर ही रहते हैं।

उसके बाद आते हैं नवीन गुप्ता, जोकि दीप जैन जी के दूसरे शिकार हैं। फिर आते हैं संजीव चौधरी और अतुल गुप्ता जो आजकल दीप जैन जी के नए शिकार हैं। ये हुए 4 लोग और पांचवें है नन्दा जी, जोकि इस बार चुनाव में प्रत्याशी नहीं है, तो उनके लिए कुछ नहीं लिखा गया और छठे है संजय अग्रवाल जिनके खिलाफ भी मैंने दीप जैन जी का कोई लेख ब्लॉग या टिपण्णी नहीं की गई है।

तो 6 में से 5 लोगों को आप सीधे-सीधे निकाल देते हैं तो क्या ऐसा है कि ये सारी मुहिम सिर्फ एक उम्मीद्वार के पक्ष में हवा बनाने के लिए चलाई जा रही है। वाह रे इंसान! सारी खुदाई एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ, यहां भी कुछ ऐसा ही खेल खेला जा रहा है।

सीए प्रोफ़ेशनल्स को बरगलाना नहीं है आसान

पर ऐसा लगता नहीं है कि सीए प्रोफ़ेशनल्स इस बहकावे में आने वाले हैं। शायद जो बात मैंने शब्दों को पिरो कर कही है, उनके दिमाग ने पहले से ही पढ़ ली हो। पहले-पहल ऐसा लग रहा था कि दीप जैन की बातों का असर शायद नए सीए वर्ग पर हो, परंतु जहां तक देखा जा रहा है, नई और यंग सीए कम्यूनिटी ज्यादा परिपक्व और समझदार है और आसानी से उसको बरगलाया नहीं जा सकता है। टेक्नोलॉजी ओर लॉजिक में नई पीढ़ी उनसे कहीं बहुत अधिक आगे है।

एक सवाल है जो बड़ी देर से परेशान कर रहा है कि कौन है वो शख्स जिसको फायदा पहुंचाने की ऐसी कोशिश की जा रही? और, वो चुपचाप क्यों है?

आइए फिर से इन तारों के सिरों को जोड़ते है, शायद कुछ और निकल के आए।

आखिर यही नाम क्यों सामने आ रहा है बारबार

Presentation1आप पूछ सकते हैं कि आखिर दीप जैन का नाम ही क्यों हर बार सामने आता है। या तो वे जानबूझ कर अपने आपको सुर्खियों में रखने के लिए इस तरह का चक्रव्युह रचते हैं, या फिर कोई उनकी सांठगांठ है। दोनों ही कारणों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है।

कहते हैं ना, बद से बदनाम अच्छा, शायद यह बात यहां भी लागू होती है। यदि आपको कोई नहीं पूछ रहा है, तो आप सड़क पर खड़े हो कर प्रधानमंत्री को गाली निकालना शुरू कर दो, सब आप को पूछने लगेंगे- क्या हुआ भाई? कौन है? क्या है, आदि-आदि।

अंधभक्ति ले डूबेगी चुनाव की नैया

अगर दूसरे पहलू पर गौर करें तो दीप जैन जी द्वारा इन्हीं वर्तमान काउंसिल मेंम्बर के इलैक्शन मेंनिफेस्टो को सरेआम प्रमोट करना और शेयर करना भी उनकी इसी अंधभक्ति को दर्शाता है।

अब दीप जैन जी के फेसबुक को खंगाला गया तो ऐसा लगा कि इस सब के पीछे कहीं-ना-कहीं उनका निजी स्वार्थ है। वरना सीए जैसे गरिमापूर्ण और सम्पन्न प्रोफेशनल को कहां इतनी फुर्सत है कि वो रोज के 8-10 घंटे फ़ेसबुक में लगा कर ऐसे ही भ्रांतिया फैलाता रहे।

अहम सवाल

सवाल उठता है कि क्या सीए की राजनीति देश की राजनीति बनती जा रही है? प्रॉफ़ेशन की कोई गरिमा नहीं? कोई भी किसी को कुछ भी लिख सकता है?

पत्रकारों की बात तो समझ में आती है कि उनकी तो दाल-रोटी ही यहीं से चलती है। परन्तु एक सीए, जोकि लोग बहुत नसीब और मेहनत से बनते हैं, ये सब और इतना कैसे कर सकता है?

लेकिन वो अंधभक्ति किस काम की जो सेंट्रल काउंसिल के चुनाव की नाव को ही ले डूबे!

Know how to download the admit card for “ICAI CA IPCC Exams 2015”

अक्टूबर 21, 2015

addmThe Institute of Chartered Accountants of India (ICAI) will be conducting the Integrated Professional Competence Course (IPCC) and final exams for CA students. The CA IPCC Group I exam is scheduled to be held on November 2, 4, 6 and 8 and Group II will be conducted on November 10, 13 and 15. ICAI CA Final Group I exam is slated to take place on November 1, 3, 5 and 7 and Group II on November 9, 12, 14 and 16. The admit cards for the same are available online.

Physical admit cards will be sent to only those who had submitted physical OMR exam forms and are found eligible, by post, generally 21 days prior to the commencement of the examination. No physical admit cards will be sent to those who applied online.

Steps to download CA IPCC admit card

Log on to the official website icai.nic.in.

Click on ICAI CA ICPP Final exam -November Admit Card

Choose Your class like ICPP/Final

Enter your registration Number

The CA ICPP Final Admit Card will be displayed

Download the same and take a print out for future reference.

It is mandatory for the candidates to have the admit cards with them at the time of exam, failing which they will not be allowed to appear for the test

Important dates of exams:

CA IPCC and final exams from November 1 to 16

For Group I: November 2, 4, 6 and 8

For Group II: November 10, 13 and 15

आईसीएआई से वेल्थ मैनेजमेंट एंड फायनेंशियल प्लानिंग कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन शुरु

अक्टूबर 21, 2015

वर्ष 2016 के लिए देश के शीर्ष संस्थान इंस्टीच्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया (आईसीएआई) से वेल्थ मैनेजमेंट एंड फायनेंशियल प्लानिंग में सर्टिफिकेट कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन शुरु हो चुका है। इसका संचालन ए-29, सेक्टर-62, नोएडा स्थित आईसीएआई भवन में होगी।

17383चार्टर्ड अकाउंटेंट के इस कोर्स के लिए बैच की शुरुआत अगले साल 9 जनवरी से होने की संभावना है।

इस कोर्स का उद्देश्य है फायनेंशियल प्लानिंग और वेल्थ मैनेजमेंट के तहत इन्वेस्टमेंट और रिटायमेंट बेनेफिट्स के लिए उचित रणनीति से सदस्यों को लाभान्वित करना। यह कोर्स व्यावहारिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है ताकि चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की वित्तीय सेवाओं की गुणवत्ता में वृद्धि हो सके। फिलहाल यह कोर्स केवल आईसीएआई के सदस्यों के लिए है।

केवल 30 सीटें, पहले आओ पहले पाओ

इस कोर्स के लिए आईसीएआई ने 15,000/- रुपए शुल्क निर्धारित किया है। यह रजिस्ट्रेशन के समय ऑनलाईन माध्यम से भी दिया जा सकता है और डिमांड ड्राफ्ट से भी भुगतेय है। डिमांड ड्राफ्ट आईसीएआई के सचिव के नाम से दिल्ली में भुगतेय होना चाहिए।

इस कोर्स के लिए केवल 30 अभ्यर्थी ही चुनें जाएंगे। सदस्य अभ्यर्थियों का चयन ’पहले आओ पहले पाओ’ की नीति पर किया जाएगा। कोर्स के तहत क्लासरुम लेक्चर और प्रैक्टिकल सेशन दोनों ही होंगे। इसकी क्लासेज देश के योग्य, जानकार जानीमानी फैकल्टियों द्वारा लिए जाएंगे।

“सीए सेण्ट्रल काउंसिल” के चुनाव में ओछी राजनीति की इंतेहा

अक्टूबर 15, 2015

ca politicsवैसे तो राजनीति और चुनाव में नेता लोग किसी भी हद तक कीचड़ उछालने को तैयार रहते हैं, पर देश के सबसे सम्मानित प्रोफेशन में से एक माने जानेवाले चार्टर्ड एकाउटेंट की केन्द्रीय और क्षेत्रीय कमिटियों के लिए हो रहे चुनाव में खेली जा रही ओछी राजनीति ने चुनावी नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है।

इस चुनाव में अपने और अपने लोगों की निजी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कुछ सीए प्रोफेशनल्स प्रोफेशन की गरिमा को ताक पर रखकर गन्दी राजनीति कर रहे हैं। इन लोगों ने अपनी भद्दी तथा आपत्तिजनक टिप्पणियों से महिलाओं को भी नहीं बख्शा है।

और तो और, यंग चार्टर्ड एकाउटेंट भी इनके नकारात्मक दृष्टिकोण से बच नहीं पाये हैं। नई दिल्ली में आईटीओ के बाहर कभी भी आपको ऐसे यंग सीए दो-तीन के समूह में चर्चा करते मिल जायेंगे।

बंदूक किसी की, कंधा किसी और का

बंदूक किसी की, कंधा किसी और का

बंदूक किसी की, कंधा किसी और का

कुछ पुराने धुरंधर सीए इस कार्य में पूरी तन्मयता के साथ संलग्न हैं। अगर आप नये-पुराने सीए प्रोफेशनलों से बात करें, तो एक नाम सबसे ज्यादा सामने आता है, वह है सीए दीप जैन। हालांकि दीप जैन अपने आप को एक्टिविस्ट के रुप में पेश करते हैं, परंतु अगर कोई ध्यान से उनके द्वारा लिखी गई फेसबुक पोस्ट को देखे तो पता चलता है कि इनके निशाने पर एक-दो ही लोग हैं, जिनसे शायद इनका व्यक्तिगत मनमुटाव है। और, हो सकता है इनके कोई आका हों, जिनके इशारे पर इन्होंने ये मुहिम छेड़ रखी है।

कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि बंदूक श्री दीप जैन के कंधे पर है, पर गोली कहीं और से ही चलती है। दीप जैन, एक काबिल “सेण्ट्रल काउंसिल मेम्बर” के बड़े ही खास माने जाते हैं। वे उनके अंधभक्त बताये जाते हैं। गौरतलब है कि दीप जैन जी का बहुत सारा इनकम टैक्स अपील सम्बधित कार्य “उन्हीं खास” सेण्ट्रल काउंसिल मेम्बर द्वारा निपटाया जाता है।

बरगलाए जा रहे हैं यंग सीए प्रोफेशनल्स

चार्टर्ड एकाउटेंट की केन्द्रीय और क्षेत्रीय कमिटियों के लिए हो रहे चुनाव में खेली जा रही ओछी राजनीति

सीए कम्युनिटी में इस बात को लेकर भी चिंता है कि लोग एकतरफा कीचड़-उछाल राजनीति कर रहे हैं, जिससे यह सम्मानित प्रोफेशन न केवल बदनाम हो रहा है बल्कि नकारात्मक विचारों को बल मिल रहा है। जो लोग इन्हें जानते हैं, वो तो इनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।

लेकिन युवा सीए प्रोफेशनल्स को एक हद तक ये लोग बरगलाने में कामयाब हो रहे हैं, जिससे युवा एवं नये सीए प्रोफेशनलों में फ्रस्टेशन बढ़ रहा है, जोकि प्रोफेशन के लिए खतरनाक है और इस नुकसान की क्षतिपूर्ति होना मुश्किल ही दिखाई दे रहा है।

तेरी कोशिश हो कि ये सूरत बदलनी चाहिए

अक्टूबर 15, 2015

Courtesy Byline:  (“हंसा जाइ अकेला” नवभारत टाइम्स पर प्रकाशित)

ज्यां पॉल सार्त्र ने 1964 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार यह कह कर ठुकराया था: “यदि कोई लेखक किसी राजनीतिक, सामाजिक या साहित्यिक विचारधारा से जुड़ा है तो उसे सिर्फ अपने खुद के संसाधनों का ही उपयोग करना चाहिए। और उसके पास अपना खुद का होता है सिर्फ लिखित शब्द। वह हर पुरस्कार जिसे वह स्वीकार करता है उसके पाठकों पर एक दबाव निर्मित कर सकता है, जिसे मैं उचित नहीं मानता।”

सार्त्र कहीं न कहीं, अनजाने में गांधी जी की इस बात के समर्थन में ही बोल रहे थे कि “राज्य हिंसा का ही संगठित रूप है।” उससे पुरस्कार लेकर आप किसी न किसी तरह के दबाव में रहेंगे ही और देर सवेर आपको अपनी विचारधारा के साथ समझौता करना ही पड़ेगा। ऐसे कम लोग होते हैं जो जान की परवाह किए बगैर भी डटे रहें। जे कृष्णमूर्ति ने आपातकाल के दौरान पुपुल जयकर से साफ़ कहा था कि वह अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं करेंगे, यदि वह चाहें तो इस शर्त पर उन्हें वार्ता के लिए भारत बुला सकती हैं। श्रीलंका में एक कम्युनिस्ट नेता माइकल परेरा से किसी जनसभा के बीच ही कृष्णमूर्ति ने कह दिया था कि यदि उन्हें असहमत होने से रोका गया और उनकी जान लेने की धमकी दी गई, तो वह तैयार हैं; कोई चाहे तो वहीं उनकी जान ले सकता है। प्रीतिश नंदी ने 1963 में एक भेंटवार्ता मेंउनसे पूछा कि उन्हें कोई जान से मार सकता है, क्या इसकी उन्हें कोई फिक्र नहीं? जवाब में कृष्णमूर्ति ने कहा “आप जरूर मुझे मार सकते हैं, पर मेरी आजादी को आप छू तक नहीं सकते।” संयुक्त राष्ट्र संघ की एक समिति में अपने भाषण के बाद मिले स्मारक चिन्ह को वह मेज पर ही छोड़ आए थे! इस तरह के साहस, स्पष्टता और स्वतंत्रता के उदाहरण भी हैं हमारे सोच और चिंतन की दुनिया में।

authors-killed.jpgउदय प्रकाश से पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू हुआ और उनके बाद नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए। इनके बाद सारा जोसफ और रहमान अब्बास ने भी अपने ईनाम लौटाए। जोसफ ने साहित्य अकादमी और अब्बास ने महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाया। लेखिका शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी परिषद से इस्तीफ़ा दिया और कवि के. सच्चिदानंद और कथाकार पी के परक्कद्वु ने साहित्य अकादमी की समितियों से इस्तीफे दिए। कन्नड़ भाषा में लिखने वाले छह लेखकों ने भी अपने पुरस्कार लौटा दिए। एक तरह से पुरस्कार के तिरस्कार का एक सिलसिला चल पड़ा है। स्पष्ट रूप से इन सभी बुद्धिजीवियों ने दादरी काण्ड के विरोध में और रूढ़ियों के खिलाफ लड़ने वाले नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे और कन्नड़ विद्वान् प्रो. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ यह कदम उठाया है। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने पुरस्कार लौटाने की निंदा की है और कहा है कि इससे साहित्य अकादमी कमजोर होगी। दूसरी ओर संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने टिप्पणी की है कि यह तो लेखकों का निजी मामला है!

अफ़सोस की बात है यह, पर पुरस्कारों के तिरस्कार का सिलसिला कहीं न कहीं देश के साहित्यिक जगत में व्याप्त दोहरे मापदंडों को भी उजागर कर रहा है। क्या जिस सरकार ने पुरस्कार दिया और जिससे लोगों ने सहर्ष पुरस्कार लिया, वह शुद्ध, पवित्र और किसी भी दोष से मुक्त थी? सिर्फ हिंसा के खिलाफ ही, और वह भी खून-खराबे के खिलाफ ही पुरस्कार लौटाए जाने चाहिए? किसी भी सरकार से कोई भी पुरस्कार लेकर कोई लेखक जाने अनजाने में उसकी हर नीति का समर्थक नहीं बन जाता? क्या भ्रष्टाचार हिंसा नहीं? क्या पूरे देश के साथ वादाखिलाफी हिंसा की श्रेणी में नहीं आएगी? जिन लेखकों ने मोदी सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करवाते हुए अपने पुरस्कार लौटाए हैं, उन्हें खुद से और साथ ही उनके पाठकों और आम नागरिक को भी ये सवाल पूछने चाहिए।

1984.jpgकिसी लेखक का तो सबसे बड़ा पुरस्कार तो यही है कि वह मूक बधिर लोगों के संसार में तार्किक और सही तरीके से सोच सकता है, खुद को व्यक्त कर सकता है, उसे और किसी पुरस्कार की जरूरत ही क्या है? उदय प्रकाश, नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी, शशि देशपांडे और साथ में अन्य कई लोगों ने अच्छा किया, हालाँकि कई लोग नयनतारा सहगल की चयनात्मक संवेदनशीलता पर सवाल उठा भी रहे हैं। उनके पुरस्कार प्राप्त करने के बाद सिख विरोधी दंगे देश भर में हुए। सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ तो पुरस्कार तब भी लौटाया जा सकता था। किसी साहित्यकार को ईनाम लेने से पहले ही सोच लेना चाहिए कि वह पुरस्कार क्यों ग्रहण कर रहा है? क्या यह पुरस्कार उसकी सृजनशीलता को निखारने में, उसके अधिक धारदार और प्रामाणिक बनाने में मदद करेगा? पुरस्कार देने वाली हर सरकार, उसकी संस्था, आपसे सहमति और चाटुकारिता की अपेक्षा रखेगी। क्या आपको कोई सरकार आपके विरोध और असहमति के लिए पुरस्कृत कर सकती है? क्या इससे पहले की देश की सभी सरकारें इतनी सही थीं कि इन वरिष्ठ साहित्यकारों को अपने पुरस्कार लौटाने का कोई मौका नहीं मिला?

author.jpgआप महानुभावों ने जो किया, वह बहुत अच्छा किया पर जिनके पास लौटने के लिए कोई पुरस्कार नहीं और फिर भी वे अपने स्तर पर असहिष्णुता कि इस संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भी समर्थन और बधाई दिए जाने की जरूरत है। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ विहीन, अपुरस्कृत, सभी गुमनाम और ईमानदार, जुझारू मित्रों को भी साधुवाद दिया जाना चाहिए जो अनर्गल और बेढंगी, मतभेद और फसाद बढ़ाने वाली बातों का हर स्तर पर विरोध करते रहे हैं। उम्मीद है सबके मिले-जुले प्रयास से सरकार को अपनी गलती का एहसास होगा।

एक विनम्र सुझाव यह भी है कि पुरस्कार लौटाने वालों को अपने इरादे भी साफ़ करने चाहिए थे। क्यों लौटा रहे हैं वे पुरस्कार वगैरा…उन्हें सरकार, प्रधानमंत्री, पुरस्कार देने वाली संस्था और आम पाठक को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखना चाहिए था, यह बताते हुए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। ऐसा नहीं कि इस देश में जब से इन नामचीन लेखकों ने लेखनी थामी है, कोई भयावह घटनाएं नहीं हुईं, या साम्प्रदायिक सौहार्द्र हमेशा से बना रहा है, बस अभी-अभी ही टूटा है। लोग पूछ रहे हैं कि पहले पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए, और उनका सवाल पूरी तरह से बेबुनियाद नहीं। यदि कोई लेखक इसलिए पुरस्कार लौटाता है क्योंकि उसका मकसद शोहरत कमाना है, तो यह देखना आसान है कि कभी पुरस्कार शोहरत दिलाता है, और कभी उसका तिरस्कार भी। हर पुरस्कार लौटाने वाले को यह सवाल खुद से पूछना चाहिए, कि उसका मकसद क्या है। एक नई किस्म की शोहरत हासिल करना, या फिर वास्तव में असहिष्णुता के खिलाफ अपनी नाराज़गी दर्ज कराना? साथ ही उन पुरस्कृत लेखकों का भी यह दायित्व बनता है कि वे पुरस्कार लेने और लौटाने के बारे में अपने क्या विचार रखते हैं। उन्होंने इस दौर में अपने पुरस्कार न लौटाने का फैसला क्यों किया है?

सकारात्मक बात तो यही है कि पुरस्कार लौटाने के प्रति सबकी पहली प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए कि यह एक सही कदम है और किसी भी तरह की द्वेष फैलाने वाली घटनाओं का विरोध करना लेखक का नैतिक कर्तव्य है। पुरस्कारों के प्रति अपनी विरक्ति दिखा कर वह एक तरह से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा भी करता है और यह जता देता है कि धन और प्रसिद्धि उसे खरीद नहीं सकते। उसे जंजीरों में भी बांधा नहीं जा सकता, उसकी दवात, कलम और आज के युग में उसका आई पैड या कंप्यूटर कोई छीन भी ले तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। फ़ैज़ ने अभिव्यक्ति की ऐसी ही आजादी के बारे में लिखा था:

faiz.jpg“मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है

कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने।”

 पर ऐसे प्रतिरोध के दौर में यह भी पूछना जरूरी है कि क्या लेखक समुदाय एक हंगामा भर खड़ा करना चाह रहा है, कि किसी बुनियादी बदलाव की तस्वीर भी उसके जेहन में साफ़ है? वह क्या इस असहिष्णुता की और हिंसा की संस्कृति का कोई विकल्प दिखा पा रहा है लोगों को? क्या वह अपने साहित्यिक दायरे में पुरस्कार की होड़ में और सत्ता पाने की कोशिश में तो नहीं लगा और इस तरह कहीं न कहीं वैसी ही संस्कृति को तो हवा नहीं दे रहा, जिसके विरोध में वह आज अपने ईनाम लौटा रहा है? क्या वह मौका मिलने पर साहित्य का मठाधीश बन कर, चयन समितियों का मुखिया बन कर, नए लेखकों को पुरस्कारों का लोभ दिखा कर साहित्य को भी बस एक अलग नाम से सस्ती सियासत का अखाड़ा तो नहीं बनाए जा रहा? दुष्यंत कुमार याद आ रहे हैं:

dushyant.jpg“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”

पूरी अस्तित्वगत ईमानदारी के साथ, पुरस्कार लौटाने वाले हर लेखक और लेखिका को यह सवाल पूछना चाहिए: उनका मकसद क्या है? अब क्या दायित्व है उनका इस विरोध के बाद?

लेखकों और कवियों का एक बहुत बड़ा गुमनाम समुदाय या तो ईमानदारी के साथ किसी ऐक्टिविजम का हिस्सा बन कर या सिर्फ अपनी अंतरदृष्टियाँ साझा करने के उद्देश्य से लेखन कार्य में लगा है। हज़ारों की तादाद में जूझते हुए लेखकों के बीच अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल की तरह कम लोग ही ख्याति पाने में सफल होते हैं। इस ख्याति के पीछे सिर्फ उनकी प्रतिभा, योग्यता और धारदार लेखन ही नहीं होता,, उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्थिति की भी भूमिका होती है। साहित्य के संसार में कई वाजपेयी और सहगल ख्याति की सुबह देखने से पहले गुमनामी की रात में ही दम तोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में जिन्होंने ख्याति अर्जित की, उनकी जिम्मेदारी भी बहुत अधिक है। उन्हें न सिर्फ साहित्यिक और सामाजिक, बल्कि राजनीतिक मूल्यों की भी दिशा-दशा तय करनी होगी। सिर्फ तिरस्कार से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, इससे आगे के रास्ते भी तय करने होंगे।

लेखन कभी भी धन कमाने का जरिया नहीं रहा। कम से इस देश में तो कभी नही रहा। अंग्रेजी में लिखने वालों को छोड़ दिया जाए, भले ही उनका साहित्य कितना भी बचकाना और सतही क्यों न हो, इस देश का आम लेखक, भले ही वह किसी भी भाषा में लिखता हो, मुफलिसी में ज़िन्दगी बिताता है। लेखन को वह जितना अधिक समय देता है, उसी अनुपात में उसे अपने घर परिवार और समाज से तिरस्कार भी मिल सकता है। आदर्शवादी, झक्की, सनकी जैसे कई खिताबों से उसे लगातार नवाजा जाता है। वह अपना खून, अपनी रूह डालता है अपने एक एक शब्द में, एक-एक कहानी और कविता में और उपेक्षा की मार झेल-झेल कर भी अपना एक संसार रचता है, अपने सपनों के साथ।

पर कितने लोग लेखक होना चाहते हैं? कितने माँ बाप हैं हमारे समाज में जो इस बात पर आह्लादित हो जाएंगे कि उनकी संतान ने लेखक बनने का फैसला किया है? मेरे ख्याल से हर मुमकिन कोशिश की जाएगी उसे रोकने की। लोग लेखक की पूजा कर सकते हैं, उसे महान बता सकते हैं, जहाँ-जहाँ जरूरत पड़े, और उपयोगी साबित हो, उसे उद्धृत कर सकते हैं; पर उनके खुद के बच्चे लेखक बनना चाहें, शायद ही कोई राजी होगा इस बात पर। ऐसे जड़वादी समाज में एक लेखक का विरोध सत्ता के मद में डूबे लोगों को कहाँ तक जगा पाता है, यह भी एक बड़ा सवाल है। आम तौर परआत्ममुग्धता और आत्मश्लाघा में लगे लेखक की बात का क्या महत्व है कि उसका पुरस्कार लौटाना सरकार को अपनी नीतियों और दर्शन को त्यागने पर मजबूर कर देगा? क्या राज्य इतना संवेदनशील होता है या फिर अपनी पूरी कुटिलता के साथ वह प्रतिरोध की आवाज़ को दबा देने के नए तरीके ईजाद करने में व्यस्त हो जाता है? सरकार के चर्चित संस्कृति मंत्री की तरफ से आया यह बयान यही दर्शाता है कि मोटी त्वचा पर खरोंच इतनी आसानी से नहीं लग सकती। जुबान पर लगा सत्ता का खून कुछ लेखकों के विरोध से धुल नहीं जाता और राज्य को सात्विकता के गुण से सजा-संवार नहीं देता।

पुरस्कार का तिरस्कार करने वाले साहित्यकारों ने अच्छा काम किया पर साथ ही उन्हें और भी रास्ते ढूंढने और सुझाने चाहिए। पुरस्कार लौटा भर देने से उनका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सिर्फ हंगामा खड़ा करने के तो हजारों तरीके हैं पर उनमें किसकी दिलचस्पी है! सवाल तो यह है कि सूरत कैसे बदलेगी देश-दुनिया की।

Courtesy Byline:  (नवभारत टाइम्स पर प्रकाशित)

लाईक और कमेंट का जानलेवा खेल

दिसम्बर 20, 2013

बदनामी का दंश

आज से दो दिन पहले (18 दिसंबर, 2013), एक एनजीओ के एग्जेक्युटिव डायरेक्टर खुर्शीद अनवर ने खुदकुशी कर ली। खबर के मुताबिक, एक अन्य एनजीओ में काम करने वाली एक लड़की ने उनपर बलात्कार का आरोप लगाया था। यह घिनौना आरोप लगने के बाद वह काफी परेशान थे। लोगों का यह मानना है कि यह कदम उन्होंने डिप्रेशन में उठाया होगा।

हत्याएं और आत्महत्याएं रोज होती हैं। इनसे मन उद्वेलित होता है, दुःख होता है। इन सबके पीछे कोई-न-कोई वजह जरूर होती है। बलात्कार का आरोप लगना आत्महत्या का सबब होने के लिए काफी है, खासकर, एक स्वयंसेवी समाजसेवक के लिए तो निश्चित तौर पर। फिर, आजकल तो इस आरोप की बदनामी का दंश कुछ ज्यादा ही जहरीला है।

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई सवाल खड़े करती है। ये सवाल मीडिया, सोशल मीडिया और आमो-ख़ास की जेहनी अपरिपक्वता और जहालत की ओर चीख-चीख कर इशारा कर रही है।

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या या हत्या?

जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी साहब अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं- “खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली। लेकिन क्या इसे सचमुच आत्महत्या कहेंगे? मैं उन्हें एक संवेदनशील मगर जुझारू व्यक्ति के रूप में जानता था। … …खुर्शीद यारबाश शख्स थे। … …कुछ हफ्ते पहले सुना कि दिल्ली में ही एक अन्य एनजीओ में कार्यरत एक्टिविस्ट ने उनके खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया है। … …आरोप है कि उसकी शराब में खुर्शीद ने कुछ मिला दिया। उसकी तबीयत बिगड़ गयी। उसे वहीं रुकना पड़ा और सुबह कथित बलात्कार हुआ। लेकिन उसने यह सब न पुलिस को रिपोर्ट किया, न मेडिकल कराया, न कोई साक्ष्य दिया। कुछ दिनों बाद यह आरोप फेसबुक पर चल पड़ा। इस पर खुर्शीद विचलित हो गए और उन्होंने मानहानि का मुकदमा कर अदालत की शरण ली। कल कुछ टीवी चैनलों पर यह मामला उठ गया। उन्हें जानने वाले भी अब फेसबुक पर गरियाने लगे।”

Courtesy: Facebook Wall of Om Thanvi

Courtesy: Facebook Wall of Om Thanvi
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वे आगे लिखते हैं- “मुझे नहीं मालूम कि बलात्कार के आरोप में सच क्या था। रिपोर्ट दर्ज होती और उचित जांच के बाद गुनाह साबित होता तो खुर्शीद अनवर को फांसी पर लटका आते। … …कैसी विडंबना है कि कानून ने अभी अपना काम शुरू ही नहीं किया था और मीडिया में कोई गुनहगार करार दे दिया गया!”

इसी मुद्दे पर नवभारत टाइम्स के ब्लॉगर अरुणेश सी दवे लिखते हैं- “सवाल उठता है कि खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या क्यों की। क्या वह अपराध बोध से ग्रस्त थे? लेकिन यह आरोप तो उन पर काफी समय से लगा हुआ था। लेकिन पिछले चंद दिनों से सोशल मीडिया और कुछ न्यूज चैनलों में उनका मीडिया ट्रायल शुरू हो गया था।”

बकौल अरुणेश सी दवे, “खुर्शीद अनवर भारत में एक खोल के अंदर सिकुड़े समाज के ऐसे चंद लोगो में से थे जो बेबाक रूप से समाज की खामियों, उसके अंदर मौजूद कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ बोलते थे। जब बहुसंख्यक समाज में पैदा होकर मुझ जैसे टटपुंजिया लेखक को इतनी धमकियां गालियां मिलती हैं, तो खुर्शीद अनवर किन हालातों में अपनी आवाज बुलंद करते थे, यह समझना मेरे लिये कोई मुश्किल काम नहीं है। और यही बात मुझे व्यथित कर गई कि जो आदमी इन सब को झेल सकता है वह क्यों बलात्कार के कथित आरोप को झेल नहीं पाया?”

केवल लाईक और कमेंट का खेल नहीं रहा अब सोशल मीडिया

यह दुर्घटना बता रही है कि आज सोशल मीडिया काफी शक्तिशाली हो चुकी है। अपनी नकारात्मक स्वरूप में इतनी शक्तिशाली कि किसी जान ले ले।

जी हां, केवल लाईक और कमेंट का खेल नहीं रहा अब सोशल मीडिया। एक समय था, जब सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करते ही लाईक और कमेंट (कॉम्पलिमेंट ज्यादा) की बारम्बारता से दिल बाग़-बाग़ हो उठता था।

फिर एक समय आया, जब इस मीडिया पर “मैं तेरी खुजाऊं, तू मेरी खुजा” का सबसे खराब चलन ने जोर पकड़ा। यह आज भी बदस्तूर जारी है।

Courtesy: Khaalbaada by Arunesh C Dave on Navbharat Times Online

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फिर एक दौर शुरू हुआ, इस मीडिया के माध्यम से अपनी विचारधारा को थोपने का- एक पेज बनाओ और अपनी सड़ी-गली सोच को इतनी बार, इतने तरह से पहुंचाओं कि दिमाग ‘करप्ट’ हो जाए।

और, आज जो दौर चल रहा है, वह है स्वार्थ-सिद्धि के लिए किसी को चिन्हित करना, लक्षित होकर तर्कों-कुतर्को का हमला बोलना, जनमानस में उसकी छवि को इस तरह तारतार कर देना कि वह खुर्शीद अनवर की तरह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाए।

कुछ दिनों पहले मैंने इसी ब्लॉग पर सोशल मीडिया पर एक आलेख लिखा था- “सोशल साइट मतलब खतरे-ही-खतरे” (https://tathakathit.wordpress.com/2012/08/24/social-site-matlab-khatre-hi-khatre/)। मैंने लिखा था- “एक वर्ग को चिन्हित कर सोशल साइटों पर जो सूचनाएं दी गईं, उसने एकबारगी सभी को ग्रस लिया। यकीन नहीं होता कि इन साइटों पर हुए कुछ अपडेट इतना बड़ा बखेड़ा पैदा कर सकते हैं। मगर ऐसा हुआ है। लिहाजा, मानना पड़ेगा कि अभिव्यक्ति का यह माध्यम एक दुधारी तलवार है। सूचना ही शक्ति है (इन्फोर्मेशन इज पॉवर) एक सकारात्मक नजरिया है, मगर इसका नकारात्मक और घिनौना रूप सर चढ़कर बोल रहा है।”

बकौल अरुणेश सी दवे, “सोशल मीडिया तो अब मेन स्ट्रीम मीडिया से भी चार कदम आगे है। यहां आपकी विचारधारा के आधार पर आपके मित्र और दुश्मन हैं। और ऐसे दुश्मन व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता रखने वाले लोगों से हजार गुना ज्यादा बेरहम और बेशरम हैं। ये उन गिद्धों के तरह हैं जो आपके कमजोर होते ही टूट पड़ने की तलाश में रहते हैं। अविकसित सोशल मीडिया सेंस एक बेहद खतरनाक चीज है, जहां वैचारिक मतभेद निजी मतभेद से ज्यादा संगीनियत रखता है।”

दरअसल, खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या नहीं की है। उसे हम जैसे सभ्य लोगों ने ताने मार-मार कर मार डाला। तो, खुश जो जाइए कि अब किसी को सजा देना अब हमारे बस से बाहर की चीज नहीं रही! अब सोशल साईट होगी अदालत और हम सब होंगे जज। लेकिन रुकिए, अगली बारी आपकी है, यह भी जान लीजिए।

अब कहां जा के सांस ली जाये

मेरे बीएचयू के एक जूनियर विनीत कुमार सिंह और मुझ जैसे अनेक लोग मेनस्ट्रीम मीडिया की ऊबन से बचने के लिए फेसबुक, ट्विटर, गूगल-प्लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सहारा लेते हैं। लेकिन, अब इन सोशल नेटवर्किंग साइटों से एक डर-सा लगने लगा है, मैं न सही, कही-न-कहीं शायद कोई अपना पीड़ित हो रहा है।

AAJKAL: Social Site Matalab Khatre Hi Khatre by Shyamnandan

AAJKAL: Social Site Matalab Khatre Hi Khatre by Shyamnandan
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लेकिन जाएं तो जाएं कहां? अखबार, टीवी और रेडियो की तरह यहां आना ही होगा, डर-डर के, सहम-सहम के, आशंका के जहर में डूबकर। स्व. जगजीत सिंह द्वारा गायी गयी एक ग़ज़ल आज की सामाजिक जहालत, अपरिपक्व सोशल मीडिया और मेरे हालात के ऊपर काफी मुफीद बैठती है: “दोस्ती जब किसी से की जाये/दुश्मनों की भी राय ली जाये/मौत का जहर है इन फिजाओं में/अब कहां जा के सांस ली जाये।”

यह दुर्घटना सोशल मीडिया की व्यापक शक्ति का महज एक छोटा-सा चित्र खींचती है। वह समय ज्यादा दूर नहीं जब यह मीडिया भाई को भाई से, पति को पत्नी से, दोस्त को दोस्त से और पड़ोसी को पड़ोसी से लड़वा देगी।

अभी समय है, हम सचेत हो जाएं तो अच्छा है। कहीं इस मीडिया की स्वतंत्रता हमारा सबसे बड़ा बंधन न बन जाए। हमें ध्यान रखना होगा कि हमारी सामाजिक अभिव्यक्ति कहीं असामाजिक षड़यंत्र न हो।

साहित्य, सिनेमा, टेलीविजन और सनी लिओनी

दिसम्बर 19, 2013

बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स की प्रेस-विज्ञप्ति का मजमून

हाल-फिलहाल फेसबुक के माध्यम से मुझसे परिचित होने वालों में एक अहम नाम है – पंकज शुक्ला सर। आज उनकी एक पोस्ट को पढ़ने के बाद यह आलेख लिखे बिना रहा न गया।

उनके पोस्ट के अनुसार, चौथे बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स के लिए जारी की प्रेस-विज्ञप्ति के मजमून एक अंश कुछ यूं है:

THE BIGGEST OF ENTERTAINERS WALK THE RED CARPET AT THE 4TH BIG STAR ENTERTAINMENT AWARDS.

SENSATIONAL PERFORMANCES BY BOLLYWOOD’s BEGAM KAREENA KAPOOR, DABANG SALMAN KHAN & THE VIVACIOUS SUNNY LEONE…

इन पंक्तियों से ऊपर वे लिखते हैं, “टेलीविजन की मानसिकता क्या है? इसे समझने के लिए चौथे बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स की अभी अभी मिली प्रेस रिलीज़ की शुरुआती लाइनें ही काफी हैं।”

बकौल पंकज सर, “सनी लिओनी एक झटके में करीना कपूर और सलमान खान की बराबरी पर आ खड़ी हुईं। उन्हें यहां तक कौन लाया? कम से कम सिनेमा में उनका संघर्ष या अदाकारी की उनकी काबिलियत तो नहीं ही ना! ये भारतीय टेलीविजन का सनी लिओनी काल है।”

मांसल-सौंदर्य बनाम उघड़ी मांसलता और नंगई

Facebook post of Pankaj Shuka Sir

Facebook post of Pankaj Shuka Sir

साहित्य और सिनेमा (टेलीविजन भी) में मांसल-सौंदर्य को बिम्ब-प्रतिबिम्ब के माध्यम से चित्रित करने की एक जबरदस्त और अक्षुण्ण परम्परा पहले भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।

रचना की दृष्टि यह गलत भी नहीं है, क्योंकि यह नैसर्गिक है। इस नैसर्गिकता को एक सम्यक और संतुलित रूप से जिसने भी उकेरा वह कृति (साहित्य व सिनेमा) ‘क्लासिक’ मानी गयी है।

लेकिन, यह भी सच है कि रचनाकारों (लेखक, निर्माता, निर्देशक, कलाकार आदि) का एक ख़ास वर्ग इस अवधारणा, पहले भी और आज भी, के विपरीत एक धारा बहाता आया है।

यह वर्ग इस सौंदर्य को उपमा, उपमान, बिम्ब, प्रतिबिम्ब, संकेत और प्रतीक से न कहकर, यह यकीन करता है कि केवल मांसलता को उघारना और बदन नंगा करना ही सृजन है।

आज यह दूसरा वर्ग हावी है और सनी लिओनी है उस वर्ग की एक सर्वश्रेष्ठ शाहकारी खोज। इसमें और ऐसे कई नामों को शामिल किया जा सकता है, उसकी एक लम्बी फेहरिश्त है।

पहले गन्दगी बोओ, फिर फैलाओ और तब गन्दी बात करो

जनता (दर्शक) का इसमें कोई दोष नहीं है। क्योंकि, वह तो ‘कल्टीवेट’ किया जाता है, जैसे फसल के लिए पहले बीज बोया जाता है, फिर खाद-पानी दी जाती है, फिर पकने दिया जाता है और अंत में काट लिया जाता है।

Babaji Ka Thullu - Popularized by Comedian Kapil Sharma

Babaji Ka Thullu – Popularized by Comedian Kapil Sharma

ठीक ऐसे ही, रचनाकारों के इस दूसरे वर्ग ने काफी रचनात्मक रूप से पहले जनता रूपी जमीन पर नंगई का बीज बोया – कैबरे, आईटम सॉन्ग, वैम्प किरदार आदि के रूप में, फिर इसे ज्यादा ‘स्पेस’ देकर स्थापित करने की सफल कोशिश की और आज हालात यह है कि आज इसकी फसल काटने से कोई भी गुरेज नहीं कर रहा है – न जनता/दर्शक और न रचनाकार।

वर्तमान में टेलीविजन भारतीय संस्कृति को प्रचारित-प्रसारित करने का एक बेहतरीन माध्यम है। इस पर दिखाए जानेवाले लगभग सभी प्रोग्राम इस संस्कृति के वाहक हैं, चाहे वह सास-बहू का झगड़ा हो, ‘नेगेटिव’ स्त्री-चरित्रों द्वारा किया घात-प्रतिघात या कपिल की फूहड़ कॉमेडी और उसका बाबाजी का ठुल्लु। लेकिन यह हमारी संस्कृति का एक नकारात्मक पहलू भर है, नंगई नहीं।

सिनेमा के बाद अब टेलीविजन की बारी है। घरेलू मनोरंजन के महान फलक पर मांसलता और नंगई का बीज बो दिया गया है। जिस प्रेस-रिलीज के अंश को पंकज सर ने अपने फेसबुक वॉल पर पोस्ट किया है, यह उससे साफ़ जाहिर है।

अभी का दौर भारतीय टेलीविजन का सनी लिओनी काल भले ही न है, लेकिन उस काल की शुरुआत हो चुकी है। प्रत्यक्षम् किं प्रमाणम् – पहले यह ग्रे शेड में होगा, फिर डार्क से डार्कर, वर्तमान सिनेमा की तरह…!

तेजपाल प्रकरण के मायने

नवम्बर 29, 2013
Career Killing Moves

Career Killing Moves
Courtesy: theindiechicks.com

कॅरियर बनाने में जितना समय लगता है, अपने आपको स्थापित करने में जो मशक्क़त करनी पड़ती है, उसके मुकाबले इसके बिगड़ने और बिखरने में कुछ समय नहीं लगता है।

तो क्या यह माना जाए कि आपका सजा-संवरा कॅरियर ताश के महल की तरह है, जो हवा की एक मामूली झोंके से भरभरा कर गिर जाएगी?

जी नहीं, बिलकुल नहीं। यह निर्भर करता है कि आपने अपनी कॅरियर को, अपनी पोजिशन, अपनी पहचान को वैसा ही बना कर रखा है न, जैसे छवि आपने कॅरियर में पहली मर्तबा बनायी थी। इसमें कोई स्खलन नहीं हुआ, बल्कि उसे निरंतर निखारने की कोशिश की।

और…, आपकी पहली छवि आपका वह निर्णय था, जो आपने बनाना चाहा था और जो संघर्ष और मेहनत के बदौतल आपको मिला। आपने उसे ढोने की कोशिश नहीं, बल्कि उसे जीने की कोशिश की।

अपनी उस छवि के प्रति आप हमेशा ईमानदार रहे, समर्पित रहे। वह जीविका साधन बना, न कि धंधा-पानी का जुगाड़ या दूकानदारी का जरिया। कम-से-कम विलासिता और व्यसन का माध्यम तो न ही बना हो।

मुलम्मा चाहे जितनी चकाचौंध भरी क्यों न हो, वह कुछ समय तक के हो सकती है। इसके उतरने में चाहे जितना समय लगे, उतरना तय है और उतरते ही वासन कितना खरा है, यह कोई भी बता सकता है। तरुण तेजपाल प्रकरण इसकी एक जीती-जागती मिसाल है।

मीडिया जगत में तहलका पत्रिका जिस तरह एक ‘फलैश’ की तरह चमकी और तरुण तेजपाल का सितारा जिस तरह से आसमान चढ़ा, जिस तरह से वह रातों-रात ‘नेशनल हीरो’ बने, क्या वह वाकई में वैसा ही था? नहीं, वह एक ‘बायस्ड एक्टिविटी’ थी। पत्रकारिता के आदर्श के एकदम विपरीत।

Kill Your Career

Kill Your Career
Courtesy: worklifecareers.com

तहलका पत्रिका की देखा-देखी ‘सनसनीखेज खबर ही सबसे बड़ी सुर्खी है, वही सबसे बड़ी खबर है’, जैसी सोच को एक सिद्धांत, एक मानक बनाने की कवायद में कई टैब्लॉयड और अख़बार कुकुरमुत्ते की तरह उग आए। विडम्बना यह कि कई टीवी न्यूज चैनल आज भी इस सोच को पाले हुए हैं।

लेकिन तेजपाल प्रकरण ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्वाग्रहग्रस्त पत्रकारिता कभी चिरस्थायी नहीं हो सकती है। यह प्रकरण एक अहम सन्देश यह भी देता है कि जिस विचारधारा से, जिस काम से आपकी छवि बनती है, उसे न केवल पेशेवर बल्कि निजी जीवन में भी जिएं.

शुक्र है कि कुछ और बड़े मीडिया हाऊस ‘खोजी पत्रकारिता’ का सही अर्थ समझते हैं। वे जानते हैं कि खोजी पत्रकारिता का मतलब सनसनी पैदा करना नहीं है। अच्छे पत्रकार जानते हैं कि केवल घटना और तथ्य महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है घटना और तथ्य के सन्दर्भ का बड़ा होना, उसका व्यापक होना।